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कहानी लक्ष्मीकांत पांडेय जी की हैं…. और जब मैंने पढ़ी तो मेरी आंखों में से आंसू नहीं रुक रहे थे…

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  कहानी लक्ष्मीकांत पांडेय जी की हैं…. और जब मैंने पढ़ी तो मेरी आंखों में से आंसू नहीं रुक रहे थे… आशा करती हूं आपको पसंद आएगी… ये कोई कहानी नही बल्कि आँखों देखी सच्ची घटना है....!! मेरी छोटी बुआ….!!!! रक्षाबंधन का त्यौहार पास आते ही मुझे सबसे ज्यादा जमशेदपुर (झारखण्ड )वाली बुआ जी की राखी के कूरियर का इन्तेज़ार रहता था. कितना बड़ा पार्सल भेजती थी बुआ जी. तरह-तरह के विदेशी ब्रांड वाले चॉकलेट,गेम्स, मेरे लिए कलर फूल ड्रेस , मम्मी के लिए साड़ी, पापाजी के लिए कोई ब्रांडेड शर्ट. इस बार भी बहुत सारा सामान भेजा था उन्होंने. पटना और रामगढ़ वाली दोनों बुआ जी ने भी रंग बिरंगी राखीयों के साथ बहुत सारे गिफ्टस भेजे थे. बस रोहतास वाली जया बुआ की राखी हर साल की तरह एक साधारण से लिफाफे में आयी थी. पांच राखियाँ, कागज के टुकड़े में लपेटे हुए रोली चावल और पचास का एक नोट. मम्मी ने चारों बुआ जी के पैकेट डायनिंग टेबल पर रख दिए थे ताकि पापा ऑफिस से लौटकर एक नजर अपनी बहनों की भेजी राखियां और तोहफे देख लें... पापा रोज की तरह आते ही टी टेबल पर लंच बॉक्स का थैला और लैपटॉप की बैग रखकर सोफ़े पर पसर गए थे. "च...

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

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सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी, गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी, लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी, नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी, बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी। वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार, देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार, नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार, सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार। महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में, ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्...

यह पोस्ट आज से ठीक 5 वर्ष पूर्व का है। आज भी उसी 5 साल पुरानी कसौटी पर पुनः अवलोकन कीजिए।राहुल गांधी के लिए मुसीबतों का दौर बढ़ता जा रहा है। राहुल गांधी एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देश की राजनीति में देखे जाते हैं जिन्होंने अभी तक अपनी राजनीतिक परिपक्वता को छुआ नहीं है।

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यह पोस्ट आज से ठीक 5 वर्ष पूर्व का है। आज भी उसी 5 साल पुरानी कसौटी पर पुनः अवलोकन कीजिए। राहुल गांधी के लिए मुसीबतों का दौर बढ़ता जा रहा है। राहुल गांधी एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देश की राजनीति में देखे जाते हैं जिन्होंने अभी तक अपनी राजनीतिक परिपक्वता को छुआ नहीं है। उनकी राजनीतिक परिपक्वता के बारे में संदेह आज भी होता है। इस बीच राहुल गांधी के और लोकप्रिय होने की बातें विभिन्न इकोसिस्टम द्वारा किए जाती रही है। यह वह कांग्रेसी इकोसिस्टम है जो कांग्रेस पार्टी ने 70 साल में बनाया है। दुर्भाग्यवश भारतीय जनता पार्टी के पास ऐसा कोई सिस्टम नहीं है। यदि होता तो निश्चित रूप से मान कर चलिए कि नरेंद्र मोदी के सामने परसेप्शन के मामले में कोई टिक ना पाता । वैसे आज भी स्थितियां कुछ ऐसी ही है लेकिन इसके लिए नरेंद्र मोदी को जो जी तोड़ मेहनत करनी पड़ी है वह देश की जनता जानती है।   कांग्रेस पार्टी को एक अमरत्व प्राप्त है। अमरत्व का मतलब देश में स्थितियां चाहे जो भी हो कांग्रेस पार्टी कभी दोषी नहीं रही। जब देश में महंगाई बढ़ी तो कहां गया कि महंगाई बढ़ गई है। वहां कांग्रेस को दोष नहीं द...

जरूर पढ़ें~मशहूर फिल्म कलाकार आशुतोष राणा की यह पोस्ट किसी ग्रुप से होती हुई मेरे पास तक पहुंची हे ,अपने बच्चों की खातिर समय निकाल कर जरूर पढियेगा....आज मेरे पूज्य पिताजी का जन्मदिन है सो उनको स्मरण करते हुए एक घटना साँझा कर रहा हूँ।बात सत्तर के दशक की है जब हमारे पूज्य पिताजी ने हमारे बड़े भाई मदनमोहन जो राबर्ट्सन कॉलेज जबलपुर से MSC कर रहे थे की सलाह पर हम ३ भाइयों को बेहतर शिक्षा के लिए गाडरवारा के कस्बाई विद्यालय से उठाकर जबलपुर शहर के क्राइस्टचर्च स्कूल में दाख़िला करा दिया। मध्य प्रदेश के महाकौशल अंचल में क्राइस्टचर्च उस समय अंग्रेज़ी माध्यम के विद्यालयों में अपने शीर्ष पर था। पूज्य बाबूजी व माँ हम तीनों भाइयों ( नंदकुमार, जयंत, व मैं आशुतोष ) का क्राइस्टचर्च में दाख़िला करा हमें हॉस्टल में छोड़ के अगले रविवार को पुनः मिलने का आश्वासन दे के वापस चले गए।मुझे नहीं पता था की जो इतवार आने वाला है वह मेरे जीवन में सदा के लिए चिन्हित होने वाला है, इतवार का मतलब छुट्टी होता है लेकिन सत्तर के दशक का वह इतवार मेरे जीवन की छुट्टी नहीं "घुट्टी" बन गया।इतवार की सुबह से ही मैं आह्लादित था, ये मेरे जीवन के पहले सात दिन थे जब मैं बिना माँ बाबूजी के अपने घर से बाहर रहा था। मन मिश्रित भावों से भरा हुआ था, हृदय के किसी कोने में माँ,बाबूजी को इम्प्रेस करने का भाव बलवती हो रहा था , यही वो दिन था जब मुझे प्रेम और प्रभाव के बीच का अंतर समझ आया। बच्चे अपने माता पिता से सिर्फ़ प्रेम ही पाना नहीं चाहते वे उन्हें प्रभावित भी करना चाहते हैं। दोपहर ३.३० बजे हम हॉस्टल के विज़िटिंग रूम में आ गए•• ग्रीन ब्लेजर, वाइट पैंट, वाइट शर्ट, ग्रीन एंड वाइट स्ट्राइब वाली टाई और बाटा के ब्लैक नॉटी बॉय शूज़.. ये हमारी स्कूल यूनीफ़ॉर्म थी। हमने विज़िटिंग रूम की खिड़की से स्कूल के कैम्पस में मेन गेट से हमारी मिलेट्री ग्रीन कलर की ओपन फ़ोर्ड जीप को अंदर आते हुए देखा, जिसे मेरे बड़े भाई मोहन जिन्हें पूरा घर भाईजी कहता था ड्राइव कर रहे थे,और माँ बाबूजी बैठे हुए थे।मैं बेहद उत्साहित था मुझे अपने पर पूर्ण विश्वास था की आज इन दोनों को इम्प्रेस कर ही लूँगा। मैंने पुष्टि करने के लिए जयंत भैया जो मुझसे ६ वर्ष बड़े हैं उनसे पूछा मैं कैसा लग रहा हूँ ? वे मुझसे अशर्त प्रेम करते थे मुझे लेके प्रोटेक्टिव भी थे बोले शानदार लग रहे हो नंद भैया ने उनकी बात का अनुमोदन कर मेरे हौसले को और बढ़ा दिया।जीप रुकी..उलटे पल्ले की गोल्डन ऑरेंज साड़ी में माँ और झक्क सफ़ेद धोती कुर्ता गांधी टोपी और काली जवाहर बंड़ी में बाबूजी उससे उतरे, हम दौड़ कर उनसे नहीं मिल सकते थे ये स्कूल के नियमों के ख़िलाफ़ था, सो मीटिंग हॉल में जैसे सैनिक विश्राम की मुद्रा में अलर्ट खड़ा रहता है एक लाइन में तीनों भाई खड़े माँ बाबूजी का अपने पास पहुँचने का इंतज़ार करने लगे, जैसे ही वे क़रीब आए, हम तीनों भाइयों ने सम्मिलित स्वर में अपनी जगह पर खड़े खड़े Good evening Mummy. Good evening Babuji. कहा। मैंने देखा good evening सुनके बाबूजी हल्का सा चौंके फिर तुरंत ही उनके चहरे पे हल्की स्मित आई जिसमें बेहद लाड़ था मैं समझ गया की ये प्रभावित हो चुके हैं । मैं जो माँ से लिपटा ही रहता था माँ के क़रीब नहीं जा रहा था ताकि उन्हें पता चले की मैं इंडिपेंडेंट हो गया हूँ .. माँ ने अपनी स्नेहसिक्त मुस्कान से मुझे छुआ मैं माँ से लिपटना चाहता था किंतु जगह पर खड़े खड़े मुस्कुराकर अपने आत्मनिर्भर होने का उन्हें सबूत दिया। माँ ने बाबूजी को देखा और मुस्कुरा दीं, मैं समझ गया की ये प्रभावित हो गईं हैं। माँ, बाबूजी, भाईजी और हम तीन भाई हॉल के एक कोने में बैठ बातें करने लगे हमसे पूरे हफ़्ते का विवरण माँगा गया, और ६.३० बजे के लगभग बाबूजी ने हमसे कहा की अपना सामान पैक करो तुम लोगों को गाडरवारा वापस चलना है वहीं आगे की पढ़ाई होगी•• हमने अचकचा के माँ की तरफ़ देखा माँ बाबूजी के समर्थन में दिखाई दीं। हमारे घर में प्रश्न पूछने की आज़ादी थी घर के नियम के मुताबिक़ छोटों को पहले अपनी बात रखने का अधिकार था, सो नियमानुसार पहला सवाल मैंने दागा और बाबूजी से गाडरवारा वापस ले जाने का कारण पूछा ?

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जरूर पढ़ें ~मशहूर फिल्म कलाकार आशुतोष राणा की यह पोस्ट किसी ग्रुप से होती हुई मेरे पास तक पहुंची हे , अपने बच्चों की खातिर समय निकाल कर जरूर पढियेगा.... आज मेरे पूज्य पिताजी का जन्मदिन है सो उनको स्मरण करते हुए एक घटना साँझा कर रहा हूँ। बात सत्तर के दशक की है जब हमारे पूज्य पिताजी ने हमारे बड़े भाई मदनमोहन जो राबर्ट्सन कॉलेज जबलपुर से MSC कर रहे थे की सलाह पर हम ३ भाइयों को बेहतर शिक्षा के लिए गाडरवारा के कस्बाई विद्यालय से उठाकर जबलपुर शहर के क्राइस्टचर्च स्कूल में दाख़िला करा दिया। मध्य प्रदेश के महाकौशल अंचल में क्राइस्टचर्च उस समय अंग्रेज़ी माध्यम के विद्यालयों में अपने शीर्ष पर था।  पूज्य बाबूजी व माँ हम तीनों भाइयों ( नंदकुमार, जयंत, व मैं आशुतोष ) का क्राइस्टचर्च में दाख़िला करा हमें हॉस्टल में छोड़ के अगले रविवार को पुनः मिलने का आश्वासन दे के वापस चले गए। मुझे नहीं पता था की जो इतवार आने वाला है वह मेरे जीवन में सदा के लिए चिन्हित होने वाला है, इतवार का मतलब छुट्टी होता है लेकिन सत्तर के दशक का वह इतवार मेरे जीवन की छुट्टी नहीं "घुट्टी" बन गया। इतवार की सुबह से ही मै...

कभी सोचना : एक सर्वे के मुताबिक भारत में साल भर में शादियों पर जितना खर्च हो रहा है, उतनी कई देशों की GDP भी नहीं है।सनातन में शादी एक संस्कार होती थी जो अब एक इवेंट बन कर रह गई हैं। पहले शादी समारोह मतलब दो लोगों को जुड़ने का एहसास कराते पवित्र विधि विधान, परस्पर दोनों पक्षों की पहचान कराते रीति- रिवाज, नेग भी मान सम्मान होते थे। पहले हल्दी और मेंहदी यह सब घर अंदर हो जाता था किसी को पता भी नहीं होता था। पहले जो शादियां मंडप में बिना तामझाम के होती थी, वह भी शादियां ही होती थी और तब दाम्पत्य जीवन इससे कहीं ज्यादा सुखी थे। परंतु समाज व सोशल मीडिया पर दिखावे का ऐसा भूत चढ़ा है कि किसी को यह भान ही नहीं है कि क्या करना है क्या नहीं ? यह एक दूसरे से ज्यादा आधुनिक और अमीर दिखाने के चक्कर में लोग हद से ज्यादा दिखावा करने लगे हैं। अड़तालिस किलो की बिटिया को पचास किलो का लहंगा भारी न लगता। माता पिता की अच्छी सीख की तुलना में कई किलो मेकअप हल्का लगता है। हर इवेंट पर घंटों का फोटो शूट थकान नहीं देता पर शादी की रस्म शुरू होते ही पंडित जी जल्दी करिए, कितना लम्बा पूजा पाठ है, कितनी थकान वाला सिस्टम है"

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कभी सोचना :  एक सर्वे के मुताबिक भारत में साल भर में शादियों पर जितना खर्च हो रहा है, उतनी कई देशों की GDP भी नहीं है। सनातन में शादी एक संस्कार होती थी जो अब एक इवेंट बन कर रह गई हैं। पहले शादी समारोह मतलब दो लोगों को जुड़ने का एहसास कराते पवित्र विधि विधान, परस्पर दोनों पक्षों की पहचान कराते रीति- रिवाज, नेग भी मान सम्मान होते थे।  पहले हल्दी और मेंहदी यह सब घर अंदर हो जाता था किसी को पता भी नहीं होता था। पहले जो शादियां मंडप में बिना तामझाम के होती थी, वह भी शादियां ही होती थी और तब दाम्पत्य जीवन इससे कहीं ज्यादा सुखी थे। परंतु समाज व सोशल मीडिया पर दिखावे का ऐसा भूत चढ़ा है कि किसी को यह भान ही नहीं है कि क्या करना है क्या नहीं ?  यह एक दूसरे से ज्यादा आधुनिक और अमीर दिखाने के चक्कर में लोग हद से ज्यादा दिखावा करने लगे हैं।  अड़तालिस किलो की बिटिया को पचास किलो का लहंगा भारी न लगता। माता पिता की अच्छी सीख की तुलना में कई किलो मेकअप हल्का लगता है। हर इवेंट पर घंटों का फोटो शूट थकान नहीं देता पर शादी की रस्म शुरू होते ही पंडित जी जल्दी करिए, कितना लम्बा...

हिन्दुओं के प्राचीन 113 मंदिर===================अखंड भारत की चारों दिशाओं में स्थित प्राचीन व भव्य 113 मंदिरों की लिस्ट। यदि आप आध्यात्मिक अनुभव लेना चाहते हैं तो यहां जरूर जाएं।इसे जरूर पढ़ें...हिन्दू धर्म : तीर्थ करना है जरूरी

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हिन्दुओं के प्राचीन 113 मंदिर =================== अखंड भारत की चारों दिशाओं में स्थित प्राचीन व भव्य 113 मंदिरों की लिस्ट। यदि आप आध्यात्मिक अनुभव लेना चाहते हैं तो यहां जरूर जाएं। इसे जरूर पढ़ें...हिन्दू धर्म : तीर्थ करना है जरूरी 1. काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी, उत्तरप्रदेश 2. श्रीरामनथा स्वामी मंदिर रामेश्वरम्, तमिलनाडु 3. श्रीजगन्नाथ मंदिर, पुरी, ओडिशा 4. सूर्य मंदिर कोणार्क, ओडिशा 5. श्रीपद्मनाभस्वामी मंदिर तिरूअनंतपुरम, केरल 6. श्रीमहाकालेश्वर मंदिर उज्जैन, मध्यप्रदेश 7. श्रीगंगा सरस्वती मंदिर बसरा, तेलंगाना 8. एकलिंगनाथजी मंदिर, उदयपुर, राजस्थान 9. श्रीद्वारकाधीश, गुजरात 10. श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर, मथुरा 11. श्रीदक्षिणेश्वर मंदिर, कोलकाता 12. श्रीसिद्धिविनायक मंदिर, मुंबई 13. श्रीवेंकटेश्वर मंदिर, तिरूपति 14. कंधारिया महादेव मंदिर, खजुराहो 15. केदारनाथ, उत्तराखंड 16. श्रीमुरूदेश्वर स्वामी मंदिर, कर्नाटक 17. पशुपतिनाथ मंदिर, काठमांडू 18. गंगोत्री मंदिर, उत्तराखंड 19. श्रीनाथजी मंदिर, नाथद्वारा 20. ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर : 21. बद्रीनारायण मंदिर, उत्तराखंड22.रघुनाथ मंदि...

कडवा है पर सत्य है । ...नीलामे दो दीनार..... "जबरदस्ती का भाईचारा ढोते हिंदुओं अपना इतिहास तो .

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कडवा है पर सत्य है ।  ...नीलामे दो दीनार..... "जबरदस्ती का भाईचारा ढोते हिंदुओं अपना इतिहास तो देखो................. ... समयकाल.. ईसा के बाद की ग्यारहवीं सदी.. भारत अपनी पश्चिमोत्तर सीमा पर अभी-अभी ही राजा जयपाल की पराजय हुई थी ... इस पराजय के तुरंत पश्चात का अफगानिस्तान के एक शहर..... गजनी का एक बाज़ार..! ऊंचे से एक चबूतरे पर खड़ी कम उम्र की सैंकड़ों हिन्दु स्त्रियों की भीड .. जिनके सामने हज़ारों वहशी से दीखते बदसूरत किस्म के लोगों की भीड़ लगी हुई थी.. जिनमें अधिकतर अधेड़ या उम्र के उससे अगले दौर में थे.. ! कम उम्र की उन स्त्रियों की स्थिति देखने से ही अत्यंत दयनीय प्रतीत हो रही थी.. उनमें अधिकांश के गालों पर आंसुओं की सूखी लकीरें खिंची हुई थी.. मानो आँसुओं को स्याही बना कर हाल ही में उनके द्वारा झेले गए भीषण दौर की कथा प्रारब्ध ने उनके कोमल गालों पर लिखने का प्रयास किया हो.. !  एक बात जो उन सब में समान थी... किसी के भी शरीर पर वस्त्र का एक छोटा सा टुकड़ा नाम को भी नहीं था.. सभी सम्पूर्ण निर्वसना ..... ! सभी के पैरों में छाले थे.. मानो सैकड़ों मील की दूरी पैदल तय की हो.. ! साम...

“विद्वान” का अर्थ पता चल गया !“विद्वान” का अर्थ है “पण्डित”

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“विद्वान” का अर्थ पता चल गया ! “विद्वान” का अर्थ है “पण्डित”, और दोनों के अर्थ है = “वह व्यक्ति जो झूठ बोले कि जातियाँ ईश्वर ने बनायी” । अतः जो व्यक्ति “विद्वान” नहीं है,अर्थात् “विद्वान के विलोम” हैं,वही सच बोलता है । “विद्वान” तो झूठ बकता है । इस परिभाषा का आविष्कार करने वाले लोग तो “विद्वान” हो नहीं सकते क्योंकि “विद्वान” को तो वे लोग झूठ बकने वाले कहते हैं । अतः इस परिभाषा का आविष्कार करने वाले लोग “विद्वान के विलोम” हैं । “विद्वान के विलोम” लोग कहते हैं कि जातियों के कारण देश गुलाम बना । श्रीराम,श्रीकृष्ण,चाणक्य आदि के समय में जातियाँ थीं,अतः भारत गुलाम था । किसका गुलाम था?यूरिशेया से आने वाले “विद्वानों” ने भारत के मूलनिवासियों को गुलाम बना लिया । अब समय आ गया है कि सब लोग “विद्वान के विलोम” बन जायें और यूरेशियनों को भगा दें । गोरी,गजनवी,अकबर,औरंगजेब आदि ने ‘हिन्दुस्तान’ को गुलाम नहीं बनाया क्योंकि वे लोग ‘हिन्दुस्तान’ में पैदा होने के कारण हिन्दू थे । गान्धार  ‘हिन्दुस्तान’ में था तो तालिबान भी हिन्दू ही है । केवल यूरेशियनों को भारतीय नहीं माना जा सकता क्योंकि वे बाहर से आये...

-माँ-बाप हमारे लिये* *ATM कार्ड बन सकते है,* *तो ,हम उनके लिए* *Aadhar Card तो बन ही सकते है. 💕💕💕

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जब एक शख्स लगभग पैंतालीस वर्ष के थे तब उनकी पत्नी का स्वर्गवास हो गया था। लोगों ने दूसरी शादी की सलाह दी परन्तु उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि पुत्र के रूप में पत्नी की दी हुई भेंट मेरे पास हैं, इसी के साथ पूरी जिन्दगी अच्छे से कट जाएगी। पुत्र जब वयस्क हुआ तो पूरा कारोबार पुत्र के हवाले कर दिया। स्वयं कभी अपने तो कभी दोस्तों के ऑफिस में बैठकर समय व्यतीत करने लगे। पुत्र की शादी के बाद वह ओर अधिक निश्चित हो गये। पूरा घर बहू को सुपुर्द कर दिया। पुत्र की शादी के लगभग एक वर्ष बाद दोहपर में खाना खा रहे थे, पुत्र भी लंच करने ऑफिस से आ गया था और हाथ–मुँह धोकर खाना खाने की तैयारी कर रहा था। उसने सुना कि पिता जी ने बहू से खाने के साथ दही माँगा और बहू ने जवाब दिया कि आज घर में दही उपलब्ध नहीं है। खाना खाकर पिताजी ऑफिस चले गये। थोडी देर बाद पुत्र अपनी पत्नी के साथ खाना खाने बैठा। खाने में प्याला भरा हुआ दही भी था। पुत्र ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और खाना खाकर स्वयं भी ऑफिस चला गया। कुछ दिन बाद पुत्र ने अपने पिताजी से कहा- ‘‘पापा आज आपको कोर्ट चलना है, आज आपका विवाह होने जा रहा है।’’ पिता ने आश्चर...

*डॉ. अम्बेडकर जी* का वह कथन सोचने पर मजबूर का देता है कि *यदि समाज के एक बड़े वर्ग को* *युद्ध से दूर नहीं किया गया होता* *तो

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.   बहुत सटीक व तार्किक विश्लेषण      कभी-कभी विचार आता है कि    1500 ई. के बाद के ब्रिटिश कितने साहसी और बुद्धिमान रहे होंगे, जिन्होंने       एक ठण्डे प्रदेश से निकलकर,  अनजान रास्ते और अनजान जगहों पर          जाकर लोगों को गुलाम बनाया.         अभी भी देखा जाए तो      ब्रिटेन की जनसंख्या और क्षेत्रफल      गुजरात के बराबर है, लेकिन उन्होंने          दशकों नहीं शताब्दियों तक        दुनिया को गुलाम बनाए रखा.    भारत की करोड़ों की जनसंख्या को     मात्र कुछ लाख या हजार लोगों ने       गुलाम बनाकर रखा, और केवल         गुलाम ही नहीं बनाया बल्कि       खूब हत्यायें और लूटपाट भी की.         उनको अपनी कौम पर             कितना गर्व होगा               कि मु...