कहानी लक्ष्मीकांत पांडेय जी की हैं…. और जब मैंने पढ़ी तो मेरी आंखों में से आंसू नहीं रुक रहे थे…
कहानी लक्ष्मीकांत पांडेय जी की हैं…. और जब मैंने पढ़ी तो मेरी आंखों में से आंसू नहीं रुक रहे थे… आशा करती हूं आपको पसंद आएगी… ये कोई कहानी नही बल्कि आँखों देखी सच्ची घटना है....!! मेरी छोटी बुआ….!!!! रक्षाबंधन का त्यौहार पास आते ही मुझे सबसे ज्यादा जमशेदपुर (झारखण्ड )वाली बुआ जी की राखी के कूरियर का इन्तेज़ार रहता था. कितना बड़ा पार्सल भेजती थी बुआ जी. तरह-तरह के विदेशी ब्रांड वाले चॉकलेट,गेम्स, मेरे लिए कलर फूल ड्रेस , मम्मी के लिए साड़ी, पापाजी के लिए कोई ब्रांडेड शर्ट. इस बार भी बहुत सारा सामान भेजा था उन्होंने. पटना और रामगढ़ वाली दोनों बुआ जी ने भी रंग बिरंगी राखीयों के साथ बहुत सारे गिफ्टस भेजे थे. बस रोहतास वाली जया बुआ की राखी हर साल की तरह एक साधारण से लिफाफे में आयी थी. पांच राखियाँ, कागज के टुकड़े में लपेटे हुए रोली चावल और पचास का एक नोट. मम्मी ने चारों बुआ जी के पैकेट डायनिंग टेबल पर रख दिए थे ताकि पापा ऑफिस से लौटकर एक नजर अपनी बहनों की भेजी राखियां और तोहफे देख लें... पापा रोज की तरह आते ही टी टेबल पर लंच बॉक्स का थैला और लैपटॉप की बैग रखकर सोफ़े पर पसर गए थे. "च...