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Showing posts from January, 2026

#भिंडरावाला को संत बनाने वाली #इंदिरा खालिस्तान के कारण नहीं मरी"इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि इंदिरा गाँधी, #करपात्री जी महाराज के पास पीएम बनने का आशीर्वाद लेने गई थी, क्योंकि करपात्री जी महाराज का आशीर्वाद कभी निष्फल नहीं जाता था। तब करपात्री जी ने इस शर्त पर आशीर्वाद दिया था कि पीएम बनते ही सबसे पहले गौ हत्या के विरुद्ध कानून बना कर गौ हत्या बंद करनी होगी, इंदिरा जी ने वादा किया कि PM बनने पर पहला काम यही करूंगी।करपात्री जी महाराज के आशीर्वाद से इंदिरा गाँधी पीएम बनी। इसके करीब दो महीने बाद करपात्री जी महाराज इंदिरा जी से मिले और उनका वादा याद दिला कर गौ हत्या के विरुद्ध कानून बनाने के लिए कहा तो इंदिरा जी ने कहा कि महाराज जी अभी तो मैं नई नई हूँ, कुछ समय दीजिए। कुछ समय बाद करपात्री जी फिर गए और कानून की मांग की लेकिन इंदिरा ने फिर टाल दिया।कई बार मिलने और वादा याद दिलाने के बाद भी जब इंदिरा ने गौ हत्या बंद नहीं की, कानून नहीं बनाया तो 7 नवम्बर 1966, उस दिन कार्तिक मास, शुक्‍ल पक्ष की अष्‍टमी तिथि थी, जिसे हम-आप #गोपाष्‍ठमी# नाम से जानते हैं, को देश का संत समाज, शंकराचार्य, अपने छत्र आदि छोड़ कर पैदल ही, ने आम जनता के साथ, गायों को आगे आगे करके संसद कूच किया, करपात्री जी महाराज के नेतृत्व में जगन्नाथपुरी, ज्योतिष पीठ व द्वारका पीठ के शंकराचार्य, वल्लभ संप्रदाय के सातों पीठों के पीठाधिपति, रामानुज संप्रदाय, मध्व संप्रदाय, रामानंदाचार्य, आर्य समाज, नाथ संप्रदाय, जैन, बौद्ध व सिख समाज के प्रतिनिधि, सिखों के निहंग व हजारों की संख्या में मौजूद नागा साधुओं को पंडित लक्ष्मीनारायण जी चंदन तिलक लगाकर विदा कर रहे थे। #लालकिला मैदान से आरंभ होकर नई सड़क व चावड़ी बाजार से होते हुए पटेल चौक के पास से संसद भवन पहुंचने के लिए इस विशाल जुलूस ने पैदल चलना आरंभ किया। रास्ते में अपने घरों से लोग फूलों की वर्षा कर रहे थे। हर गली फूलों का बिछौना बन गया था।यह हिंदू समाज के लिए सबसे बड़ा ऐतिहासिक दिन था। इतने विवाद और अहं की लड़ाई होते हुए भी सभी शंकराचार्य और पीठाधिपतियों ने अपने छत्र, सिंहासन आदि का त्याग किया और पैदल चलते हुए संसद भवन के पास मंच पर समान कतार में बैठे। उसके बाद से आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ। नई दिल्ली का पूरा इलाका लोगों की भीड़ से भरा था। संसद गेट से लेकर चांदनी चौक तक सिर ही सिर दिखाई दे रहा था। कम से कम 10 लाख लोगों की भीड़ जुटी थी, जिसमें 10 से 20 हजार तो केवल महिलाएं ही शामिल थीं।#जम्मू-कश्मीर से लेकर केरल तक के लोग गो हत्या बंद कराने के लिए कानून बनाने की मांग लेकर संसद के समक्ष जुटे थे। उस वक्त इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी और गुलजारी लाल नंदा गृहमंत्री थे।इस सिंहनाद को देख कर इंदिरा ने सत्ता के मद में चूर होकर संतों, साधुओं, गायों और जनता पर अंधाधुंध गोलियों की बारिश

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#भिंडरावाला को संत बनाने वाली #इंदिरा खालिस्तान के कारण नहीं मरी" इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि इंदिरा गाँधी, #करपात्री जी महाराज के पास पीएम बनने का आशीर्वाद लेने गई थी, क्योंकि करपात्री जी महाराज का आशीर्वाद कभी निष्फल नहीं जाता था।  तब करपात्री जी ने इस शर्त पर आशीर्वाद दिया था कि पीएम बनते ही सबसे पहले गौ हत्या के विरुद्ध कानून बना कर गौ हत्या बंद करनी होगी,  इंदिरा जी ने वादा किया कि PM बनने पर पहला काम यही करूंगी। करपात्री जी महाराज के आशीर्वाद से इंदिरा गाँधी पीएम बनी।  इसके करीब दो महीने बाद करपात्री जी महाराज इंदिरा जी से मिले और उनका वादा याद दिला कर गौ हत्या के विरुद्ध कानून बनाने के लिए कहा तो इंदिरा जी ने कहा कि महाराज जी अभी तो मैं नई नई हूँ, कुछ समय दीजिए। कुछ समय बाद करपात्री जी फिर गए और कानून की मांग की लेकिन इंदिरा ने फिर टाल दिया। कई बार मिलने और वादा याद दिलाने के बाद भी जब इंदिरा ने गौ हत्या बंद नहीं की, कानून नहीं बनाया तो 7 नवम्बर 1966, उस दिन कार्तिक मास, शुक्‍ल पक्ष की अष्‍टमी तिथि थी, जिसे हम-आप  #गोपाष्‍ठमी# नाम से जानते हैं,...

प्रोपेगेंडा है।Jawaharlal Nehru ने AIIMS नहीं बनाया।AIIMS Rajkumari Amrit Kaur की वजह से अस्तित्व में आया।AIIMS इसलिए बना क्योंकि एक महिला नेज़मीन दी, पैसा जुटाया, सिस्टम से लड़ी और काम करवा कर दिखाया—जबकि कांग्रेस देखती रही और बाद में ब्रांडिंग कर गई।वह ज़मीन, जिसका ज़िक्र कभी नहीं होताAIIMS दिल्ली, अंसारी नगर की लगभग 190 एकड़ की कीमती ज़मीन पर खड़ा है।यह ज़मीन:न सरकार ने खरीदीन अधिग्रहित कीयह राजकुमारी अमृत कौर की पारिवारिक संपत्ति थी—जो उन्होंने दान में दी।आज के मूल्य पर यह ज़मीन हज़ारों-हज़ार करोड़ रुपये की है।कांग्रेस ने इस पर एक रुपया भी खर्च नहीं किया।वह पैसा, जो नेहरू के पास नहीं थाआज़ादी के बाद भारत आर्थिक रूप से टूटा हुआ था।कांग्रेस के पास न संसाधन थे, न तैयारी—सिर्फ़ नारे थे।तब अमृत कौर ने:न्यूज़ीलैंड से विदेशी सहायता जुटाईअंतरराष्ट्रीय मेडिकल सहयोग लायाउपकरण, प्रशिक्षण और विशेषज्ञता की व्यवस्था कीअगर कांग्रेस सक्षम होती, तो विदेशी मदद की ज़रूरत ही क्यों पड़ती?वह क़ानून, जिसे कांग्रेस टालती रहीAIIMS अधिनियम, 1956नेहरू की तत्परता से नहीं,अमृत कौर के लगातार दबाव से पास हुआ।उन्होंने लड़ाई लड़ी:अफ़सरशाही की सुस्ती सेमंत्रिमंडल

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एक महिला ने AIIMS बनाया। कांग्रेस ने उनका नाम मिटा दिया। नेहरू ने श्रेय ले लिया। AIIMS राजकुमारी अमृत कौर ने बनाया। इतिहास की किताबें लिखती हैं— “नेहरू ने AIIMS बनाया”। यह पंक्ति इतिहास नहीं, प्रोपेगेंडा है। Jawaharlal Nehru ने AIIMS नहीं बनाया। AIIMS Rajkumari Amrit Kaur की वजह से अस्तित्व में आया। AIIMS इसलिए बना क्योंकि एक महिला ने ज़मीन दी, पैसा जुटाया, सिस्टम से लड़ी और काम करवा कर दिखाया— जबकि कांग्रेस देखती रही और बाद में ब्रांडिंग कर गई। वह ज़मीन, जिसका ज़िक्र कभी नहीं होता AIIMS दिल्ली, अंसारी नगर की लगभग 190 एकड़ की कीमती ज़मीन पर खड़ा है। यह ज़मीन: न सरकार ने खरीदी न अधिग्रहित की यह राजकुमारी अमृत कौर की पारिवारिक संपत्ति थी— जो उन्होंने दान में दी। आज के मूल्य पर यह ज़मीन हज़ारों-हज़ार करोड़ रुपये की है। कांग्रेस ने इस पर एक रुपया भी खर्च नहीं किया। वह पैसा, जो नेहरू के पास नहीं था आज़ादी के बाद भारत आर्थिक रूप से टूटा हुआ था। कांग्रेस के पास न संसाधन थे, न तैयारी—सिर्फ़ नारे थे। तब अमृत कौर ने: न्यूज़ीलैंड से विदेशी सहायता जुटाई अंतरराष्ट्रीय मेडिकल सहयोग लाया उपकरण, प्रशि...

नशे में चूर, हिंसा की भूख से पागल,AK-47 और RPG उठाएदो हज़ार से ज़्यादा हत्यारेएक गांव की ओर बढ़ रहे थे…उस गांव मेंतीस हज़ार निहत्थे लोग थे—मांएं, बच्चे, बुज़ुर्गजिन्हें मौत बस एक कदम दूर से घूर रही थी।और उन 30,000 जिंदगियों और कत्लेआम के बीचसिर्फ़ 40 भारतीय सैनिकचट्टान की तरह खड़े थे।बाक़ी मदद रास्ते में थी,पर रास्ते काट दिए गए थे।चारों तरफ़ दुश्मन,पीछे हटने का कोई विकल्प नहीं।यह कोई फ़िल्मी दृश्य नहीं था।यह भारतीय सेना की वह गाथा थीजो शोर नहीं करती—सीधे इतिहास में उतरती है।यह कहानी हैदक्षिण सूडान के मलाकाल की।जहाँ संयुक्त राष्ट्र की शांति चौकीअचानक“व्हाइट आर्मी” नाम केनरसंहार के इरादे से आए विद्रोहियों से घिर गई।गांव वालों को लगा—अब सब खत्म है।लेकिन वे भूल गए थेकि उनके गांव के दरवाज़े परकौन खड़ा है।भारतीय सेना।इस टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे थेमेजर समर तूर(8 राजपूताना राइफल्स)जब हालात देखकरकई पीसकीपिंग दस्ते डगमगा गए,तब समर तूर आगे बढ़े—और नेतृत्व को आदेश नहीं,उदाहरण बना दिया।व्हाइट आर्मी ने झुंड बनाकरचौकी को रौंदने की कोशिश की।उनका भरोसा संख्या पर था—घमंड हथियारों पर।पर उन्हें नहीं पता थाकि सामनेरणनीति खड़ी है।72 घंटे।लगातार।भारतीय सैनिकों ने ऐसा जवाब दियाकि 2,000 की भीड़अपने ही साए से डरने लगी।यह सिर्फ़ गोलीबारी नहीं थी—यह दिमाग़ की जंग थी।भारतीय स्नाइपर्स ने800 मीटर दूर सेविद्रोही कमांडरों कोएक-एक कर खामोश करना शुरू किया।दुश्मन को समझ ही नहीं आया—गोली कहां से आ रही है,कमान कौन संभाले,और अब भागें या लड़ें?मेजर तूर की बनाई रणनीति नेउनकी कमान भी तोड़ीऔर मनोबल भी।जब उग्र भीड़ नेघेरा तोड़ने की कोशिश की,तब BMP-2 बख़्तरबंद वाहनआगे बढ़ेऔर दुश्मन का रास्ताउसी पर बंद कर दिया।नतीजा साफ़ था—2,000 हारे।40 जीते।अनुशासन नेअराजकता को कुचल दिया।व्हाइट आर्मीपीछे नहीं हटी—वो हथियार छोड़कर भागी।मलाकाल बच गया।हज़ारों जिंदगियां बच गईं।इस अद्वितीय नेतृत्व और साहस के लिएमेजर समर तूर कोशौर्य चक्र से सम्मानित किया गया।उन्होंने साबित कर दिया—भारतीय सैनिक के लिएसीमा नहीं,कर्तव्य सर्वोपरि होता है।लेकिन यह विजयबलिदान के बिना नहीं आई।लेफ्टिनेंट कर्नल महिपाल सिंह(9 मैकेनाइज़्ड इन्फैंट्री)घात में फंसे BMP काफ़िले कोखुद लीड करते हुए आगे बढ़ेताकि भारतीय घेरा न टूटे।छाती में गोलियां लगीं,पर बंदूक नहीं गिरी।आख़िरी सांस तकजवाबी फायर करते रहे।सूबेदार धर्मेश सांगवानऔरसूबेदार कुमार पाल सिंहअकोबो में2,000 की उग्र भीड़ के सामनेडटकर खड़े रहे !

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नशे में चूर, हिंसा की भूख से पागल, AK-47 और RPG उठाए दो हज़ार से ज़्यादा हत्यारे एक गांव की ओर बढ़ रहे थे… उस गांव में तीस हज़ार निहत्थे लोग थे— मांएं, बच्चे, बुज़ुर्ग जिन्हें मौत बस एक कदम दूर से घूर रही थी। और उन 30,000 जिंदगियों और कत्लेआम के बीच सिर्फ़ 40 भारतीय सैनिक चट्टान की तरह खड़े थे। बाक़ी मदद रास्ते में थी, पर रास्ते काट दिए गए थे। चारों तरफ़ दुश्मन, पीछे हटने का कोई विकल्प नहीं। यह कोई फ़िल्मी दृश्य नहीं था। यह भारतीय सेना की वह गाथा थी जो शोर नहीं करती— सीधे इतिहास में उतरती है। यह कहानी है दक्षिण सूडान के मलाकाल की। जहाँ संयुक्त राष्ट्र की शांति चौकी अचानक “व्हाइट आर्मी” नाम के नरसंहार के इरादे से आए विद्रोहियों से घिर गई। गांव वालों को लगा— अब सब खत्म है। लेकिन वे भूल गए थे कि उनके गांव के दरवाज़े पर कौन खड़ा है। भारतीय सेना। इस टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे थे मेजर समर तूर (8 राजपूताना राइफल्स) जब हालात देखकर कई पीसकीपिंग दस्ते डगमगा गए, तब समर तूर आगे बढ़े— और नेतृत्व को आदेश नहीं, उदाहरण बना दिया। व्हाइट आर्मी ने झुंड बनाकर चौकी को रौंदने की कोशिश की। उनका भरो...

एक थे राघव राम कौल काश्मीरी ब्राह्मण, जिनको गौ मांस खिला कर मुसलमान बनाया गया था! इनके पुत्र का नाम शेख इब्राहीम था। शेख इब्राहीम के पुत्र का नाम शेख अब्दुल्ला! शेख अब्दूल्ला के पुत्र का नाम फारुक अब्दूल्ला... फारुक अब्दूल्ला के पुत्र है उमर अब्दूल्ला।है राघव राम कौल का अब्दूल्ला परिवार। जब तक इनकी ताकत थी कश्मीर में इन्होंने भी लोगों

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एक थे राघव राम कौल काश्मीरी ब्राह्मण, जिनको गौ मांस खिला कर मुसलमान बनाया गया था!   इनके पुत्र का नाम शेख इब्राहीम था। शेख इब्राहीम के पुत्र का नाम शेख अब्दुल्ला!  शेख अब्दूल्ला के पुत्र का नाम फारुक अब्दूल्ला... फारुक अब्दूल्ला के पुत्र है  उमर अब्दूल्ला। है राघव राम कौल का अब्दूल्ला परिवार।  जब तक इनकी ताकत थी कश्मीर में इन्होंने भी लोगों के साथ वही व्यवहार किया है, वही नैरेटिव चल रहा था, डोगरा सिंधी कश्मीरी पंडित बाल्मीकि समाज, सब के मांस को नोच नोच कर खाया, पलायन हत्या से भरा काश्मीर के इतिहास का 70 साल। एक थे चितपावन ब्राह्मण जिनका नाम तुलसीराम था!  उन्होंने टीपू सुल्तान से बचने के लिए इस्लाम कुबूल कर लिया था और अपने गांव ओवैस को उन्होंने अपना सरनेम ओवैसी बना लिया!  उन्ही तुलसीराम के पुत्र का नाम अब्दुल वाहिद ओवैसी था! अब्दूल वाहिद के पुत्र का नाम सुल्तान ओवैसी था! सुल्तान ओवैसी के पुत्र का नाम सलाहुद्दीन ओवैसी था!  सलाहुद्दीन ओवैसी के पुत्र का नाम असद्दुदीन ओवैसी और अकबरूद्दीन ओवैसी। और विडंबना देखिये कि ओवैशी ब्रदर जिस गोडसे से घृणा करते है...