ज्यादा पुरानी नही मात्र 1960 की फोटो है , श्रीनगर के बाजार में अपनी दुकानो के बाहर बेफिक्री के साथ आराम से बैठकर धूप सेकते हुये कश्मीरी हिन्दू।1960 में इन्हें मालूम नहीं था कि मात्र 20 वर्ष बाद इनते व इनकी अगली पीढ़ी के साथ यहां क्या-क्या होने वाला हैं। पूरी घाटी हिन्दू विहीन हो जायेगी।इन्हें गौर से देखिये ये श्रीनगर के बाजार में धूप सेंकते कश्मीरी पंडित हैं' कश्मीरी पंडितों का दर्द इन दिनों फिर सुर्खियों में है। वे कश्मीरी पंडित, जो कभी कश्मीर के धनाढय रहवासी थे और जिनके पास सैकड़ों बीघा सेवफल के बगीचे, केसर का फलता - फूलता कारोबार और स्वर्ग कहलाने वाली कश्मीर घाटी थी। 1960 में लिए गए इस चित्र में देखाजा सकता है कि शीत के दिनों में ये किस आनंद और बेफिक्री से बाजार में बैठकर धूप सेंकते थे। इन्हें अपनी वेशभूषा साफा, कुर्ता, धोती, बंडी पहनने का सुख हासिल था। किंतु ये अपनी अस्मिता के प्रति संघर्ष करने में चूके और हमलावरों ने इन्हें इनकी मातृभूमि कश्मीर से खदेड़ दिया। अब इनके परिजन दर - दर की ठोकरे खा
ज्यादा पुरानी नही मात्र 1960 की फोटो है , श्रीनगर के बाजार में अपनी दुकानो के बाहर बेफिक्री के साथ आराम से बैठकर धूप सेकते हुये कश्मीरी हिन्दू।
1960 में इन्हें मालूम नहीं था कि मात्र 20 वर्ष बाद इनते व इनकी अगली पीढ़ी के साथ यहां क्या-क्या होने वाला हैं। पूरी घाटी हिन्दू विहीन हो जायेगी।
इन्हें गौर से देखिये ये श्रीनगर के बाजार में धूप सेंकते कश्मीरी पंडित हैं' कश्मीरी पंडितों का दर्द इन दिनों फिर सुर्खियों में है। वे कश्मीरी पंडित, जो कभी कश्मीर के धनाढय रहवासी थे और जिनके पास सैकड़ों बीघा सेवफल के बगीचे, केसर का फलता - फूलता कारोबार और स्वर्ग कहलाने वाली कश्मीर घाटी थी। 1960 में लिए गए इस चित्र में देखाजा सकता है कि शीत के दिनों में ये किस आनंद और बेफिक्री से बाजार में बैठकर धूप सेंकते थे। इन्हें अपनी वेशभूषा साफा, कुर्ता, धोती, बंडी पहनने का सुख हासिल था। किंतु ये अपनी अस्मिता के प्रति संघर्ष करने में चूके और हमलावरों ने इन्हें इनकी मातृभूमि कश्मीर से खदेड़ दिया। अब इनके परिजन दर - दर की ठोकरे खा रहे हैं, यहां - वहां तंबू बनाकर शरणार्थियों की तरह रह रहे हैं। शांति और आनंद से भरे इस फोटो में यह चेतावनी छुपी हुई है कि जो अपनी अस्मिता के लिए नहीं जागता, उसे दर - दर भटकना पड़ता है
#कश्मीर
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