सामने जवान बेटे की लाश पड़ी थी और अंग्रेज अफसर ने कहा— 'बस एक बार कह दे कि ये तेरा बेटा है, तो इसे जलाने की इजाजत दे दूँगा।' पर उस क्रांतिकारी पिता ने जो जवाब दिया, उसे सुनकर पत्थर भी रो पड़े होंगे..."यह कहानी एक ऐसे पिता की है, जिसने अपने इकलौते बेटे के शव को छूने तक से इनकार कर दिया था, ताकि देश का सिर न झुके। यह कहानी है मास्टर अमीरचंद की, जो दिल्ली षड्यंत्र केस (1912) के प्रमुख क्रांतिकारी थे।फेसबुक पर यह कहानी शायद ही किसी ने इस तरह से पढ़ी हो।😭 वो पिता जिसने अपने शहीद बेटे का शव पहचानने से इनकार कर दिया! 😭 लेकिन 8 मई, 1915 को दिल्ली की जेल में जो हुआ, वह पत्थर दिल इंसान को भी रुला देने के लिए काफी है।मास्टर अमीरचंद दिल्ली के एक स्कूल में अध्यापक थे, लेकिन उनके अंदर क्रांति की ज्वाला जल रही थी। लाला हरदयाल और रासबिहारी बोस जैसे दिग्गज उन्हें अपना मार्गदर्शक मानते थे। जब लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंकने की योजना बनी, तो मास्टर अमीरचंद उसके मुख्य सूत्रधारों में से एक थे।वो मंजर जो कलेजा चीर दे:अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उनके साथ उनके युवा बेटे को भी पकड़ा गया था। अंग्रेजों ने उनके बेटे को इतनी बेरहमी से प्रताड़ित किया कि जेल की कोठरी में ही उसकी मौत हो गई।अंग्रेज अफसर ने सोचा कि बेटे की लाश देखकर पिता टूट जाएगा और सारे राज उगल देगा। वे मास्टर अमीरचंद को उस ठंडी कोठरी में ले गए जहाँ उनके बेटे का बेजान शरीर पड़ा था।मास्टर अमीरचंद ने अपने जिगर के टुकड़े की लाश को देखा। उनकी आँखों में आंसू उमड़े, लेकिन उन्होंने उन्हें बाहर नहीं आने दिया। उन्होंने अंग्रेज अफसर की आँखों में आँखें डालकर कहा—"यह मेरा बेटा नहीं है। मैं इसे नहीं पहचानता।"वे जानते थे कि अगर उन्होंने भावना में बहकर अपनी पहचान उजागर की, तो उनके बाकी क्रांतिकारी साथी पकड़े जाएंगे। एक पिता ने अपने देश के लिए अपने बेटे को 'लावारिस' छोड़ दिया।8 मई, 1915 को जब मास्टर अमीरचंद को फांसी के फंदे की ओर ले जाया जा रहा था, तो उनके चेहरे पर एक अलौकिक शांति थी। उन्होंने फंदे को चूमा और कहा—"मैने अपना सब कुछ भारत मां को दे दिया, अब बस यह जान बाकी है, यह भी ले लो।"जिस बाप ने अपने बेटे
सामने जवान बेटे की लाश पड़ी थी और अंग्रेज अफसर ने कहा— 'बस एक बार कह दे कि ये तेरा बेटा है, तो इसे जलाने की इजाजत दे दूँगा।' पर उस क्रांतिकारी पिता ने जो जवाब दिया, उसे सुनकर पत्थर भी रो पड़े होंगे..."यह कहानी एक ऐसे पिता की है, जिसने अपने इकलौते बेटे के शव को छूने तक से इनकार कर दिया था, ताकि देश का सिर न झुके। यह कहानी है मास्टर अमीरचंद की, जो दिल्ली षड्यंत्र केस (1912) के प्रमुख क्रांतिकारी थे।
फेसबुक पर यह कहानी शायद ही किसी ने इस तरह से पढ़ी हो।
😭 वो पिता जिसने अपने शहीद बेटे का शव पहचानने से इनकार कर दिया! 😭 लेकिन 8 मई, 1915 को दिल्ली की जेल में जो हुआ, वह पत्थर दिल इंसान को भी रुला देने के लिए काफी है।
मास्टर अमीरचंद दिल्ली के एक स्कूल में अध्यापक थे, लेकिन उनके अंदर क्रांति की ज्वाला जल रही थी। लाला हरदयाल और रासबिहारी बोस जैसे दिग्गज उन्हें अपना मार्गदर्शक मानते थे। जब लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंकने की योजना बनी, तो मास्टर अमीरचंद उसके मुख्य सूत्रधारों में से एक थे।
वो मंजर जो कलेजा चीर दे:
अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उनके साथ उनके युवा बेटे को भी पकड़ा गया था। अंग्रेजों ने उनके बेटे को इतनी बेरहमी से प्रताड़ित किया कि जेल की कोठरी में ही उसकी मौत हो गई।
अंग्रेज अफसर ने सोचा कि बेटे की लाश देखकर पिता टूट जाएगा और सारे राज उगल देगा। वे मास्टर अमीरचंद को उस ठंडी कोठरी में ले गए जहाँ उनके बेटे का बेजान शरीर पड़ा था।
मास्टर अमीरचंद ने अपने जिगर के टुकड़े की लाश को देखा। उनकी आँखों में आंसू उमड़े, लेकिन उन्होंने उन्हें बाहर नहीं आने दिया। उन्होंने अंग्रेज अफसर की आँखों में आँखें डालकर कहा—
"यह मेरा बेटा नहीं है। मैं इसे नहीं पहचानता।"
वे जानते थे कि अगर उन्होंने भावना में बहकर अपनी पहचान उजागर की, तो उनके बाकी क्रांतिकारी साथी पकड़े जाएंगे। एक पिता ने अपने देश के लिए अपने बेटे को 'लावारिस' छोड़ दिया।
8 मई, 1915 को जब मास्टर अमीरचंद को फांसी के फंदे की ओर ले जाया जा रहा था, तो उनके चेहरे पर एक अलौकिक शांति थी। उन्होंने फंदे को चूमा और कहा—
"मैने अपना सब कुछ भारत मां को दे दिया, अब बस यह जान बाकी है, यह भी ले लो।"
जिस बाप ने अपने बेटे के शव को छूने तक का हक इसलिए छोड़ दिया ताकि हम आज़ाद घूम सकें, आज हम उनका नाम तक नहीं जानते। क्या हम इतने एहसानफरामोश हो गए हैं?
आज इस महान पिता और उनके बलिदान को अपनी वॉल पर जगह दें। उनकी आत्मा को शांति तब नहीं मिली होगी जब वो शहीद हुए, बल्कि तब मिलेगी जब हम उन्हें याद रखेंगे। 🇮🇳
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