आज की कड़वी सच्चाई#कामुकता #लड़का हो या #लड़की सभी के अन्दर आज कूट कूट के भरी है, आज के समय 15 वर्ष की लड़किया प्रेग्नेंट हो रही हैं पर उन्हें ये नहीं पता होता है कि वो किससे प्रेग्नेंट होती है

आज की कड़वी सच्चाई
#कामुकता #लड़का हो या #लड़की सभी के अन्दर आज कूट कूट के भरी है, आज के समय 15 वर्ष की लड़किया प्रेग्नेंट हो रही हैं पर उन्हें ये नहीं पता होता है कि वो किससे प्रेग्नेंट होती है

पेशे से मै भारत के एक बड़े शहर में सीनियर गायनकोलॉजिस्ट हूं,
एक बार मेरे पास एक लड़की आती है जिसे पेट में हल्के दर्द की समय था वो अभी क्लास 11 में पढ़ती थी, और और महज 15 16 साल की थी,

मैने शुरुवाती जांच की तो मुझे शक हुआ कि हो सकता है ये प्रेग्नेंट है, लेकिन जब रिपोर्ट आई तो वो सच में।प्रेग्नेंट थी,

मुझे लगा कि उसके साथ किसी ने कुछ गलत तो नहीं किया इस लिए मैने कम से कम 1 से 2 घंटा उसका समय लिया और काउंसलिंग की जिसमें इस बात की पुष्टि हुई कि किसी ने गलत नहीं किया है

मैने कुछ दावा देके उसका भरोसा जीता और बोला 2 दिन बाद फिर आओ

आज दूसरा दिन था
वो आई

मैने बोला और कैसी हो दर्द कैसा है

उसने बोला मम दर्द ठीक है लेकिन पेट में भारी पान लगता है

मैने बोला " बेटा किसी के साथ कोई रिलेशनशिप में हो ? "

उसने बोला नहीं मम मै तो बस स्कूल जाती हूं

फिर मैने बिना समय गवाए बोला
" देखो तुम 2 3 वीक की प्रेग्नेंट हो तुम्हारा बच्चा स्वास्थ्य लेकिन डरने की बात नहीं ये बात पूरी तरह से गोपनीय है
अब तुम बताओ इस बच्चे को जन्म देना चाहती हो या दवा देके इसे साफ करना चाहती हो"

उसने बिना कुछ सोचे बोला डॉक्टर मेरी उम्र नहीं की मै बच्चे को पैदा करु इस लिए आप इसे साफ कर दीजिए

मैने बोला कि अच्छा ठीक है तो जरा उसे बुलाओ जिसका ये बच्चा है, क्यों की मुझे जरूरी काम है बिना ये जाने मै आगे नहीं बढ़ सकती

उसने बोला मुझे नहीं पता कि किसका बच्चा है ये

मैने बोला क्यों ऐसा कैसे हो सकता है,

इसे उसने बोला उसके 7 से ज्यादा लड़कों के साथ संबंध है

जिसे सुनकर मैं हैरान थी मैने उससे पूछा उसने ऐसा क्यों किया

उसने जवाब दिया पहली बार तो बस ये जानने के लिए किया था कि कैसा लगता है धीरे धीरे आदत बन गई
उसके बाद अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए अलग लग लड़के कुछ भी करने को तैयार रहते थे अगर मैं अपना शरीर उन्हें सौंप दूं तो

मैने पूछा तुम्हारी ऐसी कौनसी जरूरत है जिसे पूरा करने की जरूरत है
जवाब था

I phone लेना उसका रिचार्ज महंगे रेस्टुरेंट में जाना पार्टी करना ट्रिप पर जाना ये सब कैसे होगा

मैने उसे समझाया बेटा जिंदगी में मित्र रखो लेकिन जिसके साथ सहवास करना है वो एक इंसान रहे उसपे उसका जवाब अजीब था

मैम आज फ्रेंड विद बेनिफिट का जमाना है मतलब ऐसे दोस्त जिनके साथ हम सब कुछ कर सकते हैं
यानी शारीरिक जरूरत भी पूरी कर सकते हैं
किसी से कोई कमिटमेंट नहीं और एंजॉय पूरा

खैर मेरे पास जवाब में कुछ नहीं था मैने उसे सलाह दी कि ये सब मत करो और बार बार नाचे साफ करना जानलेवा है

वो वहां से गई लेकिन साल भर में ना जाने कितनी ऐसी लड़कियों आगई जो सिर्फ ये चाहती थी कि उनके बारे में किसी को पता ना चले और ये उनकी प्रेग्नेंसी भी खत्म हो जाए

मेरा सवाल बच्चों से नहीं उनके मां बाप से क्या आप पैसे कमाने में इतना बिजी है कि बच्चे क्या कर रहे कहां जा रहे आप को नहीं पता ??
और मा से भी आजकल की मां मोबाइल में इतना बिजी है कि। उन्हें होश नहीं की उनकी बेटियां और बेटे कहां जा रहे हैं क्या कर रहे हैं
क्या कभी अपने जानने की कोशिश की आप की बेटी जो मोबाइल इस्तेमाल कर रही है उसकी कीमत क्या है
??

#से@क्स की अति कैसे #जीवन-ऊर्जा को खा जाती है?

#एक आयुर्वेदिक दृष्टि @से@क्स स्वयं में न तो पाप है और न ही कमजोरी, लेकिन जब वह लत बन जाता है, तो वह धीरे-धीरे मनुष्य की जीवन-शक्ति को भीतर से खा जाता है। आयुर्वेद मनुष्य को केवल जैविक शरीर नहीं मानता, बल्कि चेतना, मन, इंद्रियाँ और प्राणशक्ति का समन्वित तंत्र मानता है। जब किसी एक इंद्रिय की भूख असंतुलित हो जाती है, तो पूरा तंत्र डगमगाने लगता है। कामे#च्छा स्वाभाविक है, पर उसकी अति शरीर और मन दोनों के लिए घातक सिद्ध होती है..!!!
#आयुर्वेद में सप्तधातुओं का सिद्धांत स्पष्ट करता है कि शरीर में बनने वाली प्रत्येक धातु क्रमशः परिष्कृत होती हुई अंत में वी#र्य या शुक्र धातु का निर्माण करती है। यह केवल प्रजनन तत्व नहीं, बल्कि जीवन-ऊर्जा का अत्यंत सूक्ष्म और शक्तिशाली रूप माना गया है। इसी से ओज का पोषण होता है, जो प्रतिरोधक क्षमता, तेज, धैर्य और मानसिक स्थिरता का आधार है..!!
#जब बार-बार उत्ते#जना, अत्यधिक वी#र्यस्राव या निरंतर काम-चिंतन के कारण इस धातु का क्षय होता है, तो शरीर को इसे पुनः निर्मित करने में अत्यधिक ऊर्जा लगानी पड़ती है। यही कारण है कि व्यक्ति धीरे-धीरे थकान, सुस्ती और आंतरिक कमजोरी का अनुभव करने लगता है।
#मानसिक स्तर पर यह लत और भी सूक्ष्म नुकसान करती है। आयुर्वेद रजोगुण और तमोगुण की अधिकता को मानसिक अशांति का कारण मानता है। लगातार उत्तेजना की खोज रजोगुण को बढ़ाती है, जिससे चंचलता, बेचैनी, असंतोष और आवेग बढ़ते हैं...!!!
#धीरे-धीरे सत्त्वगुण, जो स्पष्टता, धैर्य और विवेक देता है, कम होने लगता है। परिणामस्वरूप व्यक्ति निर्णय लेने में अस्थिर हो जाता है, स्मरणशक्ति कमजोर पड़ती है और एकाग्रता घटने लगती है।
#शारीरिक लक्षण भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगते हैं। कमर और घुटनों में कमजोरी, आंखों की चमक कम होना, बालों का झड़ना, त्वचा का निस्तेज होना, जल्दी थक जाना, चिड़चिड़ापन और नींद की गड़बड़ी—ये सब वात-पित्त असंतुलन के संकेत माने जाते हैं...!!
#अधिक उत्तेजना पित्त को भड़काती है और बार-बार क्षय वात को बढ़ाता है। वात का प्रकोप शरीर को अंदर से सूखा और कमजोर करता है। से$क्स की लत का एक सामाजिक आयाम भी है। जब मन लगातार भोग की तलाश में रहता है, तो सामने वाला व्यक्ति एक संवेदनशील साथी नहीं, बल्कि इच्छा की वस्तु बन जाता है।
#इससे रिश्तों में सम्मान और विश्वास कम होने लगता है। आयुर्वेद इसे “प्रज्ञापराध” कहता है—अर्थात बुद्धि का अपराध। जब व्यक्ति जानते हुए भी असंयमित व्यवहार करता है, तो रोग केवल शरीर तक सीमित नहीं रहता, वह जीवन की दिशा को प्रभावित करने लगता है।
#आयुर्वेद संयम को दमन नहीं मानता, बल्कि ऊर्जा के संरक्षण और रूपांतरण का साधन मानता है। ब्रह्मचर्य का वास्तविक अर्थ है—ऊर्जा का विवेकपूर्ण उपयोग। वही शक्ति जब अध्ययन, साधना, रचनात्मक कार्य या शारीरिक परिश्रम में लगती है, तो व्यक्ति का तेज, आत्मबल और व्यक्तित्व निखरता है। संयम व्यक्ति को दुर्बल नहीं, बल्कि सशक्त बनाता है।
#अंततः निष्कर्ष यही है कि से#क्स स्वयं कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी अति और लत मनुष्य को धीरे-धीरे भीतर से खोखला कर देती है। आयुर्वेद संतुलन, मर्यादा और जागरूकता का मार्ग दिखाता है।
#जब इच्छा पर नियंत्रण होता है, तभी शक्ति सुरक्षित रहती है। और जब शक्ति सुरक्षित रहती है, तभी जीवन स्थिर, तेजस्वी और संतुलित बनता है...!!!!

क्या आप सब लोग मेरी बात से सहमत हो
कभी सोचा है. जब एक #औरत अपनी मर्ज़ी से किसी म@र्द के करीब आती है, तो वो असल में क्या करती है? दुनिया इसे अक्सर सिर्फ़ एक शारीरिक सं@बंध समझ लेती है। लेकिन उसके लिए वो पल सिर्फ़ शरीर का नहीं होता। वो भरोसे का होता है… समर्पण का होता है… और उस गहरे यकीन का होता है, जो शब्दों से नहीं एहसासों से दिया जाता है..!!!

जब वो खुद को किसी के हवाले करती है, तो वो सिर्फ़ पास नहीं आती… वो अपनी सारी हि#चक छोड़ती है। वो अपने पुराने डर पीछे छोड़ती है। वो अपनी बनाई हुई दीवारें गिरा देती है। और सच कहूँ तो, दीवारें गिराना आसान नहीं होता...!!

एक औरत सालों में भरोसा बनाती है। वो हर किसी के सामने खुद को पूरी तरह नहीं खो#लती। लेकिन जिस दिन वो खोल देती है… उस दिन वो उस आदमी को सिर्फ़ एक साथी नहीं मानती। वो उसे अपना सुकून मान लेती है। अपना सुरक्षित ठिकाना. वो बिना शब्दों के कह रही होती है..!!!

मैं तुम्हें अपना सबसे नाज़ुक हिस्#सा सौं#प रही हूँ… इसे संभाल लेना। उसे उस पल कोई प्रदर्शन नहीं चाहिए होता।
उसे जुड़ाव चाहिए। उसे वो एहसास चाहिए कि वो अकेली नहीं है। कि जो हाथ उसे छू रहे हैं, वही हाथ उसे थामे भी रहेंगे। लेकिन अगर वही आदमी उस भरोसे की कीमत नहीं समझ पाता...!!!

अगर उसने उस समर्पण को सिर्फ़ एक क्षणिक चाह समझ लिया… तो औरत के भीतर कुछ टूटता है। वो बाहर से सामान्य दिखती है। वो मुस्कुराती भी है। बात भी करती है। लेकिन अंदर कहीं एक खामोश दरार पड़ जाती है। और वो दरार धीरे-धीरे खाई बन जाती है...!!!

फिर चाहे वो कितनी भी बार पास आए, उसके भीतर का वो हिस्सा, जो कभी पूरी तरह खु#ला था, अब आधा बंद हो जाता है। उसकी आँखें वही रहती हैं… लेकिन चमक बदल जाती है। उसका स्पर्श वही रहता है…

लेकिन ग#र्माहट कम हो जाती है। क्योंकि उसके लिए रिश्ता सिर्फ़ श#रीर का मेल नहीं था। वो आत्माओं का भरोसा था।

जब एक औरत प्रेम में खुद को सौंपती है, तो वो हारकर नहीं… चुनकर आती है। वो मजबूरी में नहीं… यकीन में आती है।
और यकीन की एक खास बात होती है. वो टूट जाए तो आवाज़ कम आती है, दर्द ज्यादा होता है।

सबसे कठिन पल वो होता है, जब वो तुम्हारी आँखों में जवाब ढूँढती है। वो पूछती कुछ नहीं… लेकिन उसका दिल पूछ रहा होता है. क्या मैं तुम्हारे लिए सिर्फ़ एक पल थी…
या सच में तुम्हारी अपनी?”

अगर उसे जवाब खाली नज़रों में मिलता है… तो वो धीरे-धीरे खुद से भी सवाल करने लगती है। क्या उसने सही इंसान चुना था? या उसने अपने दिल को गलत हाथों में रख दिया?

और यकीन मानो… जिस दिन एक औरत खुद से ये सवाल करने लगे, उस दिन रिश्ता बाहर से भले ज़िंदा दिखे, अंदर से कमज़ोर हो चुका होता है। औरत को सं#बंध में भूख नहीं चाहिए। उसे अपनापन चाहिए।

उसे वो सुकून चाहिए जिसमें वो पूरी तरह खो सके… और फिर भी पूरी तरह सुरक्षित महसूस करे। उसे ये एहसास चाहिए कि उसका दिया हुआ भरोसा उसकी कमज़ोरी नहीं, उसकी ताकत है। अगर तुमने उसके मन को समझा…

उसकी खामोशियों को सुना… उसकी आँखों में छिपे डर को पहचाना… तो वो तुम्हारे साथ हर तूफान में खड़ी रहेगी।
लेकिन अगर तुमने उसके समर्पण को हल्के में लिया…
तो वो शोर नहीं करेगी। वो बस धीरे-धीरे पीछे हट जाएगी।

नज़रों से नहीं… दिल से।और याद रखना औरत का दिया हुआ भरोसा दुनिया की सबसे नाज़ुक चीज़ों में से एक है।
उसे पाना आसान नहीं होता। उसे संभालना ज़िम्मेदारी है।
और अगर वो टूट जाए… तो उसे पहले जैसा बना पाना लगभग नामुमकिन है।

इसलिए अगर कभी कोई औरत तुम्हें इतना करीब आने दे कि वो अपनी दीवारें गिरा दे… तो समझ लेना उसने तुम्हें चुना है।
तुम्हारी ताकत देखकर नहीं… तुम्हारी संवेदनशीलता पर भरोसा करके। उस भरोसे की इज़्ज़त करना।
क्योंकि शरीर का स्पर्श कुछ पल रहता है…
लेकिन आत्मा का घाव उम्र भर साथ चलता है...!!!!

क्या आप सब लोग मेरी बात से सहमत हो,,,

अब मैं इसे पढ़ने वालो से पूछती हूं समाज में फैल रहे इस नासूर का जिम्मेदार कौन है ??
आज कल की फिल्म या सोशल मीडिया पे फैली गंदगी ?? अपना जवाब दीजिए

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