देश में सबसे अधिक मूर्ति अंबेडकर का टूटता है जो इस बात का प्रमाण है कि *देश की जनता अंबेडकरवाद से ऊब चुकी है और इसे जड़ से उखाड़ फेंकना चाहती है।,,
लो जी एक और बाबा सांप की मूर्ति का सिर तन से जुदा कर दिया किसी ने अगर देश की जनता अंबेडकरवाद को पसंद करता तो मूर्ति क्यों तोड़ता,,।
देश में सबसे अधिक मूर्ति अंबेडकर का टूटता है जो इस बात का प्रमाण है कि *देश की जनता अंबेडकरवाद से ऊब चुकी है और इसे जड़ से उखाड़ फेंकना चाहती है।,,!
#अम्बेडकर
इतिहास केवल तथ्यों का संग्रह नहीं होता, यह एक सचेत चयन भी होता है—क्या याद रखा जाए, और किसे भुला दिया जाए। भारतीय संविधान निर्माण के संदर्भ में, यह चयन स्पष्ट रूप से सत्ता की रणनीति और राजनीतिक लाभ से प्रेरित था। सर बी. एन. राउ जैसे व्यक्ति, जिनकी भूमिका संविधान के निर्माण में निर्णायक और केंद्रीय थी, को सामूहिक स्मृति से लगभग मिटा दिया गया। वहीं, डॉ. अंबेडकर को संविधान का एकमात्र और संपूर्ण पर्याय बना दिया गया।
यह विस्मरण कोई आकस्मिक चूक या लापरवाही नहीं थी; यह कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर नेहरू की उस राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था जिसमें प्रतीकों के ज़रिये एक विशेष प्रकार की सामाजिक इंजीनियरिंग की जा रही थी। अंबेडकर—जो दलित समुदाय के सबसे प्रखर और प्रभावशाली नेता थे—उस राजनीतिक प्रयोग के सर्वोत्तम प्रतीक थे। उनके नाम पर योजनाएं, स्मारक और संस्थान बनाए गए—और यह आवश्यक भी था, क्योंकि वे सामाजिक न्याय के लिए एक महत्वपूर्ण प्रतीक थे। लेकिन राउ को न कहीं सार्वजनिक स्मरण मिला, न उन्हें वह सम्मान दिया गया जिसके वे अधिकारी थे। संविधान सभा के भाषणों में उनकी उपस्थिति, विधि आयोग की रिपोर्टों में उनके विस्तृत नोट्स, या यहां तक कि शिक्षा पाठ्यक्रमों में भी उनका उल्लेख न्यूनतम रहा।
राउ की योग्यता असाधारण थी ये इस अध्याय में और कहने की जरूरत नहीं है। वे न तो एक आंदोलनकारी थे, न कोई करिश्माई नेता, और न ही राजनीतिक प्रतीक—इसलिए शायद भारतीय राजनीति ने उन्हें ‘कम दृष्टिगोचर’ या 'अदृश्य' बनाना आसान समझा। उनकी सादगी और प्रसिद्धि से दूर रहने की प्रवृत्ति ने भी इसमें योगदान दिया।
यहां प्रश्न यह नहीं है कि अंबेडकर को क्यों प्रमुखता दी गई, बल्कि यह है कि राउ को क्यों भुला दिया गया। क्या इसका संबंध केवल जातिगत राजनीति से था? क्या उनकी ब्राह्मण पहचान से जुड़े किसी पूर्वग्रह ने उनके असाधारण योगदान को अदृश्य कर दिया? क्या एक नए भारत में ब्राह्मण प्रतीकों को हटाकर दलित प्रतीकों की स्थापना ही सामाजिक न्याय की एकमात्र व्याख्या बन गई? ये प्रश्न भारतीय इतिहास के मूल्यांकन के लिए महत्वपूर्ण हैं। यही इस पुस्तक का मूल उद्देश्य है कि इस विषय पर व्यापक मंथन किया जाए और जो गलतियां इतिहास में दर्ज हैं उन्हें सुधारा जाए। क्योंकि यह स्मृति का सच्चा लोकतंत्र नहीं, बल्कि एक प्रकार का स्मृति-प्रबंधन है—जहांऐतिहासिक तथ्यों की जगह राजनीतिक सुविधा और तात्कालिक लाभ ले लेते हैं। राउ को पुनर्स्थापित करना किसी विशेष वर्ग को बढ़ावा देना नहीं है, बल्कि इतिहास के साथ ईमानदारी करना है, और संविधान निर्माण की प्रक्रिया की समग्रता को स्वीकार करना है। संविधान की आत्मा केवल उसके शब्दों में नहीं, बल्कि उसकी रचना प्रक्रिया में भी बसती है। और जब तक उस प्रक्रिया के सभी प्रमुख शिल्पियों को उचित पहचान नहीं दी जाएगी, तब तक भारतीय संविधान का इतिहास अधूरा ही रहेगा।
आज जबकि भारतीय लोकतंत्र एक नई सामाजिक चेतना और आत्म-पहचान के साथ उभर रहा है, यह आवश्यक है कि संविधान की रचना-प्रक्रिया को केवल एक प्रतीकात्मक कथा न बनाया जाए। यह स्वीकार करने का समय आ गया है कि डॉ. अंबेडकर भले ही एक सामाजिक चिंतक और दलित प्रतिनिधि थे, पर संविधान की बुनियादी संरचना और उसका प्रारंभिक मसौदा सर बी. एन. राउ ने तैयार किया था। प्रतीकों को सम्मान मिले, यह उचित है, परंतु वास्तविक प्रतिभाओं को विस्मृत कर देना कहीं से भी न्यायसंगत नहीं है।
संविधान किसी एक जाति, समुदाय या नेता की देन नहीं है, बल्कि यह उन सभी अदृश्य हाथों और मेधावी मस्तिकों की सम्मिलित कृति है जिन्होंने उसकी नींव डाली। राउ जैसे व्यक्तित्वों को जानना, स्वीकारना और सम्मान देना भारत की बौद्धिक विरासत को पुनर्स्थापित करने की दिशा में पहला कदम होगा, और यह भारतीय इतिहास के प्रति एक सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
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