इस पोस्ट के बाद आप कहेंगे कि बदला लो तो ऐसे लो वरना मत लो, जब हिनू को क्रोध आता है तो ना बसे जलती है ना ही देश विरोधी नारे लगते है बस ज्वालामुखी फटता है और उसका लावा सबकुछ जला डालता है। जब हिनू प्रतिशोध लेता है तो क्या होता है,,,,,? एक झांकी देखिये।बात 1761 की है पानीपत का युद्ध समाप्त हो चुका था, एक लाख मराठे मारे गए थे। इस युद्ध मे सबसे ज्यादा नुकसान पेशवा वंश का हुआ था क्योकि उसके उत्तराधिकारी विश्वास राव वीरगति को प्राप्त हुए थे। मगर एक वंश और था जिसने अपने 4 हीरे खो दिए थे ये थे सिंधिया। पानीपत के युद्ध मे सिंधिया परिवार के 5 लोग लड़े थे जिसमे से 4 शहीद हुए बस एक बच गए महादजी सिंधिया।युद्ध मे महादजी सिंधिया का पैर कट गया था और वे 2 साल तक चल फिर नही पाए। महादजी के भाइयो को बेरहमी से मारा गया था।उत्तर भारत मे अफगानी पठानों का भारी प्रभाव था इनके सरदार नजीब खान ने ही अब्दाली को बुलवाया था और इन सभी पठानों ने Eस्लाम के नाम पर अब्दाली को समर्थन दिया था तथा भारत से गद्दारी की थी। इसलिए महादजी ने प्रण लिया की भारतभूमि पर अब कोई अफगान जिंदा नही बचेगा।1766 में महादजी सिंधिया स्वस्थ होकर पुणे आये, सिंहासन पर बैठे पेशवा माधवराव के सामने अपनी तलवार निकाल कर रख दी और कहा आप बस इसे चलाने का आदेश दे मैं अफगानों के सिर आपके कदमो में रख दूंगा। पेशवा ने उनकी छिपी प्रतिभा को जान लिया, उन्हें अपना सेनापति और ग्वालियर का शासक बनाया।फिर तो क्या था 1767 में महादजी सिंधिया ने यमुना पार की तथा मराठा साम्राज्य का विस्तार शुरू किया। 1771 में उन्होंने फिर से दिल्ली में लाल किले पर भगवा फहरा दिया। दिल्ली में महादजी ने अपनी तलवार हवा में लहरा दी जिसका सीधा अर्थ था जहाँ जो अफगान दिखे उसे मारो। 1766 से ही पठानों की मौत का सिलसिला शुरू हुआ और 1773 तक जारि रहा।मराठो ने चुनचुनकर पानीपत का बदला लिया और 5 लाख पठानों का कत्लेआम कर दिया। नजीब खां की किस्मत अच्छी थी कि वो पहले ही मर गया मगर उसका बेटा दर बदर ठोकर खाता रहा। मराठो का खौफ इतना था कि पठानों को कही शरण भी नही मिली।इसके बाद मराठो ने रुहेलखंड पर हमला किया, हरिद्वार में पठानों ने मंदिर तोड़कर मस्जिदे बना दी थी। मराठो ने फिर से मंदिरों को खड़ा कर दिया तथा यहाँ 1 लाख पठानों को और मारा गया। पठानों की मौत का समाचार

इस पोस्ट के बाद आप कहेंगे कि बदला लो तो ऐसे लो वरना मत लो, जब हिनू को क्रोध आता है तो ना बसे जलती है ना ही देश विरोधी नारे लगते है बस ज्वालामुखी फटता है और उसका लावा सबकुछ जला डालता है। जब हिनू प्रतिशोध लेता है तो क्या होता है,,,,,? 
एक झांकी देखिये।

बात 1761 की है पानीपत का युद्ध समाप्त हो चुका था, एक लाख मराठे मारे गए थे। इस युद्ध मे सबसे ज्यादा नुकसान पेशवा वंश का हुआ था क्योकि उसके उत्तराधिकारी विश्वास राव वीरगति को प्राप्त हुए थे। मगर एक वंश और था जिसने अपने 4 हीरे खो दिए थे ये थे सिंधिया। पानीपत के युद्ध मे सिंधिया परिवार के 5 लोग लड़े थे जिसमे से 4 शहीद हुए बस एक बच गए महादजी सिंधिया।

युद्ध मे महादजी सिंधिया का पैर कट गया था और वे 2 साल तक चल फिर नही पाए। महादजी के भाइयो को बेरहमी से मारा गया था।

उत्तर भारत मे अफगानी पठानों का भारी प्रभाव था इनके सरदार नजीब खान ने ही अब्दाली को बुलवाया था और इन सभी पठानों ने Eस्लाम के नाम पर अब्दाली को समर्थन दिया था तथा भारत से गद्दारी की थी। इसलिए महादजी ने प्रण लिया की भारतभूमि पर अब कोई अफगान जिंदा नही बचेगा।

1766 में महादजी सिंधिया स्वस्थ होकर पुणे आये, सिंहासन पर बैठे पेशवा माधवराव के सामने अपनी तलवार निकाल कर रख दी और कहा आप बस इसे चलाने का आदेश दे मैं अफगानों के सिर आपके कदमो में रख दूंगा। पेशवा ने उनकी छिपी प्रतिभा को जान लिया, उन्हें अपना सेनापति और ग्वालियर का शासक बनाया।

फिर तो क्या था 1767 में महादजी सिंधिया ने यमुना पार की तथा मराठा साम्राज्य का विस्तार शुरू किया। 1771 में उन्होंने फिर से दिल्ली में लाल किले पर भगवा फहरा दिया। दिल्ली में महादजी ने अपनी तलवार हवा में लहरा दी जिसका सीधा अर्थ था जहाँ जो अफगान दिखे उसे मारो। 1766 से ही पठानों की मौत का सिलसिला शुरू हुआ और 1773 तक जारि रहा।

मराठो ने चुनचुनकर पानीपत का बदला लिया और 5 लाख पठानों का कत्लेआम कर दिया। नजीब खां की किस्मत अच्छी थी कि वो पहले ही मर गया मगर उसका बेटा दर बदर ठोकर खाता रहा। मराठो का खौफ इतना था कि पठानों को कही शरण भी नही मिली।

इसके बाद मराठो ने रुहेलखंड पर हमला किया, हरिद्वार में पठानों ने मंदिर तोड़कर मस्जिदे बना दी थी। मराठो ने फिर से मंदिरों को खड़ा कर दिया तथा यहाँ 1 लाख पठानों को और मारा गया। पठानों की मौत का समाचार अब्दाली को मिल गया था मगर इस बार वो इन्हें बचाने नही आया। पठानों में भागदौड़ मच रही थी कुछ नेपाल भाग गए तो कुछ सिखों के क्षेत्र में।

महादजी ने सिखों को भी पत्र लिखा और पठानो को मराठो के हवाले करने को कहा। एक हिनू दूसरे हिनू से ना लड़े इसलिए सिखों ने नवरात्रि के समय कई पठान मराठो को सौप दिए। मराठो ने इन सबके सिर काटकर तुलजा भवानी को बलि चढ़ाई।

अंततः एक समय ऐसा आया कि अफगान भारत मे बचे ही नही। इतिहास में पहली बार हिनुओ ने क्रोध किया और ऐसा सर्वनाश किया कि पूरी कौम ही नक्शे से मिट गई थी। आज भी अगर आप उत्तर भारत मे जाएंगे तो आपको अफरीदी और पठान मुट्ठी भर भी शायद ही मिले। जबकि इतिहास में उनकी यहाँ पर बस्ती हुआ करती थी।

ये होता है भारतीयों का गुस्सा, आज ये का विरोध करने वाले लोग उन्ही पठानों की तरह है। ये नही जानते कि अभी भले ही अब्दाली का साथ दो मगर बाद में तुम्हारा क्या होगा वो सिर्फ भगवान ही जानता है। हिनू बहुत सहिष्णु समाज है उसे सहिष्णु बनाये रखे, जिस दिन सिर फिरा रोहिल्लो की तरह अस्तित्व मिट जाएगा और फिर नरक में बोलते रहना इंडिया इज एन इन्टॉलरेंट नेशन।

#indianairforcepower #history  #folowerseveryone 

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