खरगे के बयान को क्या बहुत सोच समझकर मुद्दा बनाया है भाजपा ने ?


खरगे के बयान को क्या बहुत सोच समझकर मुद्दा बनाया है भाजपा ने ?      

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने आजादी के लिए कुर्बानी वाला बयान देकर आजादी के इतिहास में बीजेपी की भूमिका पर जो सवाल खड़े किए हैं उससे कांग्रेस के गड़े मुर्दे ही उखाड़े जायेंगे। सब से पहले खरगे और कांग्रेस को यह बताना पड़ेगा कि क्या 1947 के पहले बीजेपी या जनसंघ नाम का कोई राजनीति दल था। फिर यह भी सवाल उठेगा कि यदि नहीं था तो जिन लोगों ने आर एस एस की स्थापना की वे क्या कर रहे थे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ?

क्या 27 सितंबर  1925 में दशमी के दिन आर एस एस संगठन का गठन करने वाले डा केशवराव बलिराम हेडगेवार का कांग्रेस और आजादी के आंदोलन से कोई लेना देना था या नहीं ?

आखिरकार 17 दिसंबर 1928 को सांडर्स की हत्या के बाद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव फरारी के दौरान डा हेडगेवार के पास ही क्यों पहुंचे थे ? 

फिर डा हेडगेवार ने उनको भय्या की ढाणी के यहां रुकवाया था। 

भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव क्यों महात्मा गांधी, मोती लाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू आदि पर भरोसा नहीं कर पा रहे थे ? इससे आजादी के आंदोलन में कुछ कांग्रेसियों का चरित्र कैसा था ? और वे कैसे अंग्रेजों के साथ भी तालमेल बैठा कर काम कर रहे थे, यह भी सामने आएगा। 

खैर सच तो यह है कि डा केशवराव बलिराम हेडगेवार भी कांग्रेस से जुड़े थे। स्कूल में पढ़ते हुए अंग्रेज इंस्पेक्टर के आने पर उन्होंने अपने साथियों के साथ मिल कर "वंदे मातरम"  का उद्घोष किया था, तो उनको स्कूल से निकाल दिया गया था। फिर उन्होंने पूना के नेशनल कालेज से मैट्रिक परीक्षा पास की। 1910 में वे डॉक्टरी पढ़ने के लिए कोलकाता चले गए। वहां क्रांतिकारियों के संपर्क में आए। क्रांतिकारी संस्था की अनुशीलन समिति के अध्यक्ष बने। 1915 से कांग्रेस में सक्रिय हो गए और 1920 में जब नागपुर में कांग्रेस का  बड़ा अधिवेशन हुआ तो उन्होंने पूर्ण स्वतंत्रता को कांग्रेस का लक्ष्य बनाने का प्रस्ताव रखा। जो पारित नहीं हो पाया। 1921 में असहयोग आंदोलन में उन्होंने गिरफ्तारी दी। सत्याग्रह भी किया। उनको एक साल जेल में रहना पड़ा। 

फिर किस तरह से जब डा केशवराव बलिराम हेडगेवार ने आर एस एस की स्थापना क्यों और किस लक्ष्य को लेकर की थी ? कैसे दो मित्रों ने जेल की एक ही कोठारी में सामाजिक संगठन बनाने का विचार किया था। 

डा हार्डिकर ने 28 दिसंबर 1923 को कांग्रेस सेवा दल का गठन किया। डा केशवराव बलिराम हेडगेवार कांग्रेस से अलग हट कर एक अलग सामाजिक संगठन खड़ा करने के पक्षधर थे। इसीलिए उन्होंने हार्डिकर का साथ कांग्रेस सेवादल में नहीं दिया। आज कांग्रेस सेवा दल कांग्रेस नेताओं के लिए दरी चादर बिछाने वाला संगठन बन कर रह गया है। क्योंकि कांग्रेस नेता अंग्रेजी मानसिकता से उबर नहीं पाए और उन्होंने सेवा दल से जुड़े कार्यकर्ताओं को अपनी सेवा का माध्यम बना डाला। 

जबकि डा केशवराव बलिराम हेडगेवार ने जिस राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की थी वह आज भी स्वतंत्र और सर्वोपरि है। भारतीय जनता पार्टी उसी आर एस एस की सोच से जुड़े लोगों का राजनीतिक संगठन है। 

अब यहीं सवाल खड़े होंगे कि क्यों डा केशवराव बलिराम हेडगेवार कांग्रेस से अलग हो गए थे ? क्या उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस नेताओं के उस चरित्र को पढ़ लिया था ? जो देश को अंग्रेजी मानसिकता का गुलाम बना कर राज करना चाहते थे। 

कालांतर में डा केशवराव बलिराम हेडगेवार की वह दूरदर्शी दृष्टि सत्य भी साबित हुई। 2014 के बाद से जब आर एस एस से निकला एक स्वयंसेवक नरेंद्र मोदी भारत का प्रधानमंत्री बना तो अंग्रेजी मानसिकता से देश को मुक्त कराने का काम शुरू हुआ है। अब असली लड़ाई अंग्रेजी मानसिकता और भारत की सनातन संस्कृति की मानसिकता के बीच की चल रही है। 

खरगे का कुत्ते वाले बयान को बीजेपी ने क्यों मुद्दा बनाया है ?

जब तक कांग्रेस के नीति निर्धारकों की समझ में यह बात आयेगी, तब तक राहुल की पद यात्रा से जो लाभ कांग्रेस को मिलता नजर आ रहा था उसका दो गुणा नुकसान हो चुका होगा। 

अभी तो कांग्रेस को यह बताना होगा कि जो लोग आजादी के आंदोलन के कांग्रेस का अंग थे। जिन डा केशवराव बलिराम हेडगेवार के जेल से रिहा होने पर आयोजित स्वागत समारोह में उनकी लोकप्रियता को देखते हुवे मोती लाल नेहरू और हकीम अजमल खां को भी भाषण देने जाना पड़ा था उन डा केशवराव बलिराम हेडगेवार को कांग्रेस से अलग क्यों होना पड़ा था। यही कांग्रेस के लिए सबसे अधिक भारी पड़ने वाला है।

जय जय श्री राम।

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