जब हम हमारे धर्मग्रंथों को पढ़ते हैं तो हम पाते हैं कि हमारे सारे धर्मग्रंथ राक्षसों के वध से भरे पड़े हैं.राक्षस भी ऐसे ऐसे वरदानों से प्रोटेक्टेड थे कि दिमाग घूम जाए..

 जब हम हमारे धर्मग्रंथों को पढ़ते हैं तो हम पाते हैं कि हमारे सारे धर्मग्रंथ राक्षसों के वध से भरे पड़े हैं.


राक्षस भी ऐसे ऐसे वरदानों से प्रोटेक्टेड थे कि दिमाग घूम जाए...



किसी को वरदान प्राप्त था कि वो न दिन में मरेगा-न रात में, न आदमी से मरेगा-न जानवर से, न घर में मरेगा-न बाहर, न आकाश में मरेगा- न धरती पर...


उसी तरह... दूसरे को वरदान था कि वे भगवान भोलेनाथ और विष्णु के संयोग से उत्पन्न पुत्र से ही मरेगा.


तो, किसी को वरदान था कि... उसके खून की जितनी बूंदे जमीन पर गिरेगी.. उसकी उतनी प्रतिलिपि पैदा हो जाएगी.


तो, कोई अपने नाभि में अमृत कलश छुपाए बैठा था.


लेकिन... हर राक्षस का वध हुआ.


हालाँकि... सभी राक्षसों का वध अलग अलग देवताओं ने अलग अलग कालखंड एवं अलग अलग प्रदेशों में किया...


लेकिन... सभी वध में एक चीज कॉमन रहा कि... किसी भी राक्षस का वध उसका स्पेशल स्टेटस हटाकर अर्थात उसके वरदान को कैंसिल कर के नहीं किया गया...

कि, तुम इतना उत्पात मचा रहे हो इसीलिए, हम तुम्हारा वरदान कैंसिल कर रहे हैं..

और, फिर उसका वध कर दिया गया हो।


बल्कि... हुआ ये कि... देवताओं को उन राक्षसों को निपटाने के लिए उसी वरदान में से रास्ता निकालना पड़ा कि इस वरदान के मौजूद रहते हम इसे कैसे निपटा सकते हैं.


और, अंततः कोशिश करने पर वो रास्ता निकला भी... 

एवं, सब राक्षस निपटाए भी गए.


कहने का मतलब है कि... परिस्थिति कभी भी अनुकूल होती नहीं है बल्कि उसे पुरुषार्थ से अनुकूल बनाई जाती है.


आप किसी भी एक राक्षस के बारे में सिर्फ कल्पना कर के देखें कि अगर उसके संदर्भ में अनुकूल परिस्थिति का इंतजार किया जाता तो क्या वो अनुकूल परिस्थिति कभी आती ??


उदाहरण के लिए सर्वचर्चित रावण को ही ले लेते हैं.


रावण के बारे में भी ये एक्सक्यूज दिया जा सकता था कि... रावण को कैसे मारेंगे भला ?

उसे तो पचासों तीर मारे और उसके सर को काट भी दिए..

लेकिन, उसका सर फिर जुड़ जाता है तो इसमें हम क्या करें ???


इसके बाद अपने इस फेल्योर का सारा ठीकरा रावण को ऐसा वरदान देने वाले ब्रह्मा पर फोड़ दिया जाता कि... उन्होंने ही रावण को ऐसा वरदान दे रखा है कि अब उसे मारना असंभव हो चुका है.


और फिर.. ब्रह्मा पर ये इल्जाम डाल कर चल दिया कि जब ब्रह्मा खुद रावण को ऐसा अमरत्व के सरीखा वरदान देकर धरती पर राक्षसों का राज लाने में लगे हैं तो भला हम क्या कर सकते हैं.


लेकिन... ऐसा नहीं हुआ... 

बल्कि, भगवान राम ने उन वरदानों के मौजूद रहते ही रावण का वध किया.


क्योंकि, यही "सिस्टम" है.


तो... पुरातन काल में हम जिसे वरदान कहते हैं... आधुनिक काल में हम उसे संविधान द्वारा प्रदत्त स्पेशल स्टेटस कह सकते हैं...

जैसे कि... अल्पसंख्यक स्टेटस, पर्सनल बोर्ड आदि आदि.


इसीलिए... आज भी हमें राक्षसों को इन वरदानों ( स्पेशल स्टेटस) के मौजूद रहते ही निपटाना होगा..

जिसके लिए हमें इन्हीं स्पेशल स्टेटस में से लूप होल खोजकर रास्ता निकालना होगा.


और, मुझे नहीं लगता है कि... इनके वरदानों (स्पेशल स्टेटस) को हटाया जाएगा...


क्योंकि, हमारे पौराणिक धर्मग्रंथों में ऐसे एक भी साक्ष्य नहीं मिलते हैं कि किसी राक्षस के स्पेशल स्टेटस (वरदान) को हटा कर पहले परिस्थिति अनुकूल की गई हो तदुपरांत उसका वध किया गया हो.


और, जो हजारों लाखों साल के इतिहास में कभी नहीं हुआ... अब उसके हो जाने में मुझे संदेह है.


परंतु... हर युग में एक चीज अवश्य हुआ है... 

और, वो है राक्षसों का विनाश.

एवं, सनातन धर्म की पुनर्स्थापना.


इसीलिए... मैं इस बारे में जरा भी भ्रमित नहीं हूँ कि ऐसा नहीं हो पायेगा.


लेकिन, घूम फिर कर बात वहीं आकर खड़ी हो जाती है कि.... भले त्रेतायुग के भगवान राम हों अथवा द्वापर के श्रीकृष्ण..


राक्षसों के विनाश के लिए हर किसी को जनसहयोग की आवश्यकता पड़ी थी.


और, जहाँ तक मैं अपने धर्मग्रंथों को समझ पाता हूँ...

तो, हर युग में राक्षसों के विनाश में जनसहयोग की आवश्यकता सिर्फ राक्षसों के विनाश के लिए ही नहीं पड़ती है..


बल्कि... इसीलिए भी पड़ती है ताकि... राक्षसों के विनाश के बाद जो एक नई दुनिया बनेगी... 

उस नई दुनिया को उनके बाद के लोग संभाल सके.


नहीं तो इतिहास गवाह है कि.... बनाने वालों ने तो भारत में आकाश छूती इमारतें और स्वर्ग को भी मात देते हुए मंदिर बनवाए थे... 


लेकिन, उसका हश्र क्या हुआ ये हम सब जानते हैं.


इसीलिए... राक्षसों का विनाश जितना जरूरी है...

उतना ही जरूरी उसके बाद उस धरोहर को संभाल के रखने की है.


और... अभी शायद उसी की तैयारी हो रही है.


अर्थात... निषादराज, वानर राज सुग्रीव, वीर हनुमान , जामवंत आदि को गले लगाया जा रहा है..

और, माता शबरी को उचित सम्मान दिया जा रहा है.


वरना, सोचने वाली बात है कि जो रावण ... पंचवटी में लक्ष्मण के तीर से खींची हुई एक रेखा तक को पार नहीं कर पाया था...

भला उसे पंचवटी से ही एक तीर मारकर निपटा देना क्या मुश्किल था.


अथवा... जिस महाभारत को श्रीकृष्ण सुदर्शन चक्र के प्रयोग से महज 5 मिनट में निपटा सकते थे भला उसके लिए 18 दिन तक युद्ध लड़ने की क्या जरूरत थी.


लेकिन... रणनीति में हर चीज का एक महत्व होता है... जिसके काफी दूरगामी परिणाम होते हैं.


इसीलिए... मैं कभी भी उतावलेपन का समर्थन नहीं करता हूँ.


क्योंकि, मुझे ये बात अच्छी तरह मालूम है कि.... रावण, कंस, दुर्योधन, रक्तबीज और हिरणकश्यपु आदि का विनाश तो निश्चित है तथा यही उनकी नियति है..!!

लंका जल रही है,

अयोध्या सज रही है और शबरी राष्ट्रपति बन रही है!

देश चला राम राज्य की ओर!

🙏जय हिंदू राष्ट्र 🙏


जय महाकाल...!!!


नोट : धर्मग्रंथ रोज सुबह नहा धो कर सिर्फ पुण्य कमाने के उद्देश्य से पढ़ने के लिए नहीं होती है..


बल्कि, हमारे धर्मग्रंथों के रूप में हमारे पूर्वज/देवताओं ने अपने अनुभव हमें ये बताने के लिए लिपिबद्ध किया है ताकि उनके आगामी वंशज ये जान सकें अगर भविष्य में फिर कभी ऐसी स्थिति उत्पन्न होगी तो उससे कैसे निपटा जाएगा.

साभार

Comments

  1. Jai shree ram . Har har mahadev

    ReplyDelete
  2. Share this to all your friends

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

बेटियों के बलात्कारियों से जब माँ ने कहा "अब्दुल अली एक-एक करके करो, नहीं तो वो मर जाएंगी "।ये सच्ची घटना घटित हुई थी 8 अक्टूबर 2001 को बांग्लादेश में।अनिल चंद्र और उनका परिवार 2 बेटीयों पूर्णिमा व 6 वर्षीय छोटी बेटी के साथ बांग्लादेश के सिराजगंज में रहता था। उनके पास जीने खाने और रहने के लिए पर्याप्त जमीन थी. बस एक गलती उनसे हो गयी, और ये गलती थी एक हिंदु होकर 14 साल व 6 साल की बेटी के साथ बांग्लादेश में रहना। एक क़ाफिर के पास इतनी जमीन कैसे रह सकती है..? यही सवाल था बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिद ज़िया के पार्टी से सम्बंधित कुछ उन्मादी लोगों का।8 अक्टूबर के दिनअब्दुल अली, अल्ताफ हुसैन, हुसैन अली, अब्दुर रउफ, यासीन अली, लिटन शेख और 5 अन्य लोगों ने अनिल चंद्र के घर पर धावा बोल दिया, अनिल चंद्र को मारकर डंडो से बाँध दिया, और उनको काफ़िर कहकर गालियां देने लगे। इसके बाद ये शैतान माँ के सामने ही उस १४ साल की निर्दोष बच्ची पर टूट पड़े और उस वक्त जो शब्द उस बेबस लाचार मां के मुँह से निकले वो पूरी इंसानियत को झंकझोर देने वाले हैं।अपनी बेटी के साथ होते इस अत्याचार को देखकर उसने कहा "अब्दुल अली, एक एक करके करो, नहीं तो मर जाएगी, वो सिर्फ १४ साल की है।"वो यहीं नहीं रुके उन माँ बाप के सामने उनकी छोटी 6 वर्षीय बेटी का भी सभी ने मिलकर ब#लात्कार किया ....

एक थे राघव राम कौल काश्मीरी ब्राह्मण, जिनको गौ मांस खिला कर मुसलमान बनाया गया था! इनके पुत्र का नाम शेख इब्राहीम था। शेख इब्राहीम के पुत्र का नाम शेख अब्दुल्ला! शेख अब्दूल्ला के पुत्र का नाम फारुक अब्दूल्ला... फारुक अब्दूल्ला के पुत्र है उमर अब्दूल्ला।है राघव राम कौल का अब्दूल्ला परिवार। जब तक इनकी ताकत थी कश्मीर में इन्होंने भी लोगों

ऋषिकेश में गङ्गा किनारे चार दिन की सड़ी हुई एक ला#श मिली थी। भीड़ इकट्ठी हो गयी, पुलिस बुला ली गयी। सबने ला#श से बार बार पूछा- "ला#श! कौन हो तुम?"ला#श का मुँह सड़ गया था। वह कुछ बोल नहीं पा रही थी। भारत में पुलिस के आगे जिन्दे लोग नहीं बोल पाते, वह तो फिर भी ला#श थी। हाँ, उसके कपड़ों ने बताया- वह एक बूढ़ी बंगालन स्त्री थी।किसी ने कहा कि मुक्ति मिल गयी। किसी ने परिजनों के लिए धिक्कार की गालियां गढ़ीं। पुलिस ने चौकीदारों से ला#श को तिरपाल में लपेटवाया और ले गयी। चौकीदारों ने मन ही मन गालियां दी- "ऐसी नौकरी तो सा#ली दुश्मन को भी न मिले..."पुलिस मुख्यालय में अधिकारी महीनों तक ला#श से उसका परिचय पूछते रहे। बीच बीच में कुछ पत्रकारों ने भी पूछा, शहर की समाजसेवी संस्थाओं के लोगों ने पूछा, उस इलाके के नेताओं ने पूछा, पर कोई उत्तर नहीं मिला।इन सबने मिल कर महीनों तक कड़ियां जोड़ीं। जाँच हुई, गायब हुए लोगों का पता किया गया,अंदाजे लगाए गए। अब ला#श बोलने लायक हुई। ला#श जानती थी कि यह जादुई यथार्थवाद का युग है, सो उसने बोलने के अनुरोध को स्वीकार कर लिया। इंस्पेक्टर ने अबकी पूछा तो ला#श सुगबुगाई। पुलिस को बल मिला, इंस्पेक्टर ने पूछा- "बुढ़िया बता! किसकी ला#श है तू? ला#श बोली- "बीना दास (वीणा) को जानते हो दारोगा साहब?""कौन बीना दास? मैं नहीं जानता किसी बीना वीणा को...""पद्मश्री बीना दास! सुभाष चन्द्र बोस के गुरु बेनीमाधव दास और समाजसेवी कमला देवी की पुत्री बीना दास। वही बीना, जिसे अंग्रेज गवर्नर को गोली मारने के कारण कालापानी की सजा हुई थी। जिसने सेलुलर जेल में दस वर्ष काटे थे।"हैं,,,?? यह कौन सी कथा है रे बुढ़िया? मैंने तो कभी नाम तक नहीं सुना..." इंस्पेक्टर झुंझला गया था।ला#श ठहाके लगा कर हँसने लगी। कुछ देर बाद बोली- "कोई बात नहीं साहब! आजाद भारत क्यों याद रखे स्वतन्त्रता संग्राम को? सुख के दिनों में दुख की कथाएँ कौन गाये...""अच्छा तो तू ही बता दे उनके बारे में..." सब एक साथ चीखे।ला#श हँसी। बोली, " सुनो! बीना के पिता बंगाल के क्रांतिकारियों में प्रतिष्ठित और पूज्य थे। उसकी माँ लड़कियों के लिए विद्यालय चलाती थी। बचपन से ही उसने सुभाष बाबू को अपने घर आते देखा था और उनसे बहुत प्रभावित रहती थी।"सबकी निगाह ला#श पर जम गई थी। वह बोलती गयी, "कलकत्ता विश्वविद्यालय से उसने बीए की परीक्षा पास की थी। दीक्षांत समारोह के दिन ही उसने अपने जीवन को सार्थक करने का मन बनाया था। इस काम में उसके पिता और मां दोनों उसके साथ थे। माँ ने जाने कहाँ से ला कर उसे भरी हुई पिस्तौल दी थी।विश्वविद्यालय में डिग्री बांटने के लिए गवर्नर स्टैनली जैक्शन आया था। वह जैसे ही मंच पर खड़ा हुआ, वीणा उठ कर आगे बढ़ी, और फायर झोंक दिया। गोली गवर्नर की कनपट्टी को छूती हुई निकक गयी। वह दूसरा फायर करती तबतक इंस्पेक्टर सोहरावर्दी ने एक हाथ से उसका गला पकड़ लिया, और दूसरे हाथ से उसके पिस्तौल वाले हाथों को ऊपर उठा दिया। वह फिर भी फायर करती रही। उसके पांचों फायर बेकार गए..."सबके चेहरे पर आश्चर्य पसरा हुआ था। वे सन्न पड़े चुपचाप सुन रहे थे। लाश ने कहा, " उसके बाद केस चला, दस साल की सजा हुई। सन 1939 तक सजा काटी। छूटने के बाद फिर आंदोलनों में सक्रिय हो गयी। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी जेल गयी..." "फिर?""फिर 1947 में देश आजाद हुआ तो बीना ने विवाह कर लिया। आयु 36 की हो गयी थी, पर सोचा कि अब सुखी जीवन जीने के दिन हैं... पर शायद ईश्वर को मंजूर नहीं था। पति का देहांत हुआ और फिर आगे पीछे कोई न दिखा! बीना ऋषिकेश आ गयी। एक स्कूल में पढ़ाती, उसी से खर्च चल जाता।""फिर?""फिर क्या? एक दिन आया जब उम्र देह पर भारी पड़ने लगी। पढ़ाने की शक्ति नहीं रही। कुछ दिन इधर उधर से मांग कर पेट भर लिया... और एक दिन सड़क पर चलते चलते ठोकर लगी,ऐसी गिरी कि उठ न सकी... वहीं से निकल ली।""ओह... हे भगवान! तुम.. आप वही हैं?"" हाँ जी! पर दुखी मत