Nirbhaya : अजमेर दरगाह के चिश्तियों ने किया था करीब 100 हिंदू...


Nirbhaya : अजमेर दरगाह के चिश्तियों ने किया था करीब 100 हिंदू...:  ज्यादातर चिश्ती आरोपियों को बरी कर चुके हैं न्यायमूर्ति  - 15 मई 1992 को अजमेर में हिंदुओं ने भारी विरोध प्रदर्शन किया था । दो दिन तक अजमेर...




- 15 मई 1992 को अजमेर में हिंदुओं ने भारी विरोध प्रदर्शन किया था । दो दिन तक अजमेर बंद रहा था । वहां दंगे जैसे हालात बन गए थे क्योंकि बलात्कार के ज्यादातर आरोपी अजमेर के चिश्ती दरगाह के मुख्य खादिम के परिवार से जुड़े हुए मुसलमान थे और इनकी शिकार हुई ज्यादातर लड़कियां हिंदू थीं । 


-30 साल बाद भी अजमेर के पॉस्को कोर्ट में मुकदमा चल रहा है । न्यूज वेबसाइट द प्रिंट के मुताबिक दिसंबर 2021 में अजमेर के पॉक्सो कोर्ट रूम में कुछ महिलाएं गुस्से में पुलिस वालों से झगड़ रही थीं । वो कह रही थीं- अब इस घटना को 30 वर्ष हो गए हैं । हम दादी, नानी बन चुकी हैं। आपलोग क्यों बार-बार बुलाते हैं हमें ? उन महिलाओं ने पॉक्सो कोर्ट के जज और वकीलों पर भी अपना गुस्सा उतार रही थीं। मौके पर उनका यौन शोषण करने वाले चिश्ती आरोपी भी मौजूद थे। महिलाओं ने कहा, 'अब हम सबका परिवार है। अब तो हमें बख्श दीजिए।' ये महिलाएं कोई और नहीं वर्ष 1992 में सामने आए अजमेर ब्लैकमेल कांड की शिकार थीं । 


-इस कांड के मुख्य आरोपियों का नाम था फारुक चिश्ती और नफीस चिश्ती ।  ये दोनों लड़के अजमेर दरगाह के परिवार से जुड़े हुए थे । यही वजह है कि उनका काफी ज्यादा रसूख था । इन दोनों का धार्मिक, सामाजिक रसूख तो था ही ये काफी पैसे वाले भी थे और इनके पास राजनीतिक ताकत भी थी । मुख्य आरोपियों में दो फारूक चिश्ती और नफीस यूथ कांग्रेस के प्रभावशाली नेता हुआ करते थे । इन दोनों के पास रॉयल एनफिल्ड बुलेट, येज्दी और जावा बाइक हुआ करती थीं। स्थानीय स्तर पर वो मशहूर हस्तियों जैसा रसूख रखते थे। अपनी खुली जीप, एंबेसडर और फिएट कार में वो शहर में टहलने निकलते । ये तब की बात है जब किसी के घर में गैस और फोन कनेक्शन होना रईसी का सबूत हुआ करते थे। चिश्ती परिवार के पास वो सब था और ये सब उनको मूर्ख हिंदुओं के द्वारा की गई जियारत के पैसे से ही मिला था । 


- ये खादिम परिवार के आरोपी लड़के रेप की तस्वीरें और वीडियो बनाकर हिंदू लड़कियों को ब्लैकमेल करते थे । साल 2003 में एक पीड़िता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वो अपने बॉयफ्रेंड के साथ थी तब नफीस और फारूक उनसे कई बार मिले । एक बार जब वो बस स्टैंड जा रही थीं तभी मारुति पर सवार नफीस और फारूक ने उन्हें कांग्रेस में एक बड़ा प्रॉजेक्ट दिलाने का वादा किया । इन दोनों के सहयोगी सैयद अनवर चिश्ती ने लड़की को कांग्रेस का फॉर्म लाकर भी दिया। एक दिन जब वो स्कूल जा रही थीं तभी रास्ते में नफीस और फारूक ने उन्हें अपनी गाड़ी से स्कूल छोड़ने का ऑफर दिया। तब तक उनकी अच्छी जान-पहचान हो चुकी थी तो लड़की मान गईं। लेकिन गाड़ी स्कूल नहीं जाकर एक फार्महाउस पहुंच गई। लड़की को लगा कि शायद यहां कांग्रेस के बड़े नेता से मुलाकात करवाने के लिए लाया गया हो, लेकिन कुछ देर बाद नफीस ने उन्हें दबोच लिया। नफीस ने धमकी दी कि अगर मुंह खोला तो वो उसे जान से मार देगा। फिर धमकियां दे-देकर उनका बलात्कार होता रहा। 


-लेकिन वो दरिंदे इतने से भी नहीं माने। उन्होंने लड़की की अश्लील तस्वीरें लीं और वीडियो बना लिए और कहा कि अगर उसने अपनी सहेलियों को यहां नहीं लाया तो सारी बात फैला दी जाएगी। जो लड़की एक बार इन दरिंदों का शिकार हो जाती, उसे अपनी सहेलियों को लाना पड़ता। इस तरह यह सिलसिला चलता रहा। मामले का खुलासा तब हुआ जब लड़कियों की तस्वीरें एक हाथ से दूसरे हाथों में पहुंचने लगीं। इन दरिंदों का शिकार हुईं कई लड़कियां अच्छे घरानों से आती थीं जिनके गार्जियन सरकारी नौकरी में थे। खबर सुर्खियों में आते ही कई परिवारों ने अजमेर छोड़ दिया।

-21 अप्रैल 1992 को पहली बार ये सनसनीखेज खुलासा तब हुआ था जब इसकी भनक दैनिक नवज्योति के क्राइम रिपोर्ट संतोष गुप्ता को भी लग गई। फिर 21 अप्रैल 1992 को दैनिक नवज्योति में गुप्ता की पहली रिपोर्ट प्रकाशित हुई। तस्वीरें विश्व हिंदू परिषद (VHP) के स्थानीय नेताओं को भी दी गई। उन्होंने पुलिस को तस्वीरें दीं और शिकायत दर्ज कराई जिसके बाद मामले की जांच शुरू हुई । लेकिन जब 15 मई 1992 को पीड़ित लड़कियों की धुंधली तस्वीरें भी प्रकाशित हुई तब जाकर शहर में बवाल मच गया। वहां दंगे जैसे हालात हो गए । दो दिन अजमेर बंद रहा था । 

- अखबार में हुए इस खुलासे के बाद लड़कियां आत्महत्या करने लगीं । उस वक्त अजमेर के डीआईजी रहे ओमेंद्र भारद्वाज ने कहा कि इस कारण यौन शोषण की शिकार लड़कियां उनके खिलाफ मुंह खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाती थीं। मामलों का खुलासा जैसे-जैसे होने लगा शोषण की शिकार लड़कियां खुदकुशी करने लगीं। इनमें ज्यादातर स्कूल या कॉलेज जाने वाली थीं। अनुराधा मारवाह की मां एक कॉलेज की वाइस प्रिंसिपल थीं। एक दिन वो रोते हुए घर आईं। उनके कॉलेज की एक लड़की ने आत्महत्या कर ली थी। पूरे 1990 के दशक में स्थानीय अखबार के दफ्तर में अक्सर लोग यह पता करने आ जाते थे कि जिस लड़की के साथ शादी के लिए रिश्ता तय हुआ है, क्या उसका ब्लैकमेल करके भी रेप हुआ था? दरअसल, जैसे ही पता चला कि अजमेर दरगाह से जुड़े मुसलमानों ने ब्लैकमेलिंग से 100 के करीब स्कूली लड़कियों का रेप किया, इलाके में हिंदू लड़कियों के पिता की मुश्किलें बढ़ गईं। सबको पता चल गया कि इलाके में हिंदू लड़कियों का मुसलमानों ने बलात्कार किया है। इसलिए वहां की लड़की को बहु बनाकर घर नहीं लाना चाहता था।

- आरोपियों को पैसे का काफी घमंड था ये पैसा हिंदुओं की जेब से ही जियारत के रूप में आता था । नवभारत टाइम्स के मुताबिक एक पीड़ित महिला ने बताया कि जब उनका गैंगरेप हुआ करता था तब उनकी उम्र महज 18 वर्ष की थी। एक बार गैंगरेप के बाद नफीस ने उन्हें 200 रुपये दिए और बोला कि इस पैसे से वो लिप्सटिक खरीद लें।

- जांच में 18 दरिंदों को नामजद आरोपी बनाया गया था । 27 मई 1992 को पुलिस ने कुछ आरोपियों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत नोटिस जारी किया। तीन दिन बाद उस वक्त के नॉर्थ अजमेर डीएसपी हरि प्रसाद शर्मा ने एफआईआर दर्ज किया। फिर सीआईडी-क्राइम ब्रांच के एसपी एनके पत्नी को जांच के लिए जयपुर से अजमेर भेजा गया। सितंबर 1992 में पत्नी ने 250 पन्नों की पहली चार्जशीट फाइल की जिसमें 128 गवाहों के नाम और 63 सबूतों का जिक्र था। अजमेर कोर्ट ने 28 सितंबर को मामले की सुनवाई शुरू की। तब आठ आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ती गई, मासूम बच्चियों का यौन शोषण करने वालों का खुलासा भी होता गया। इस तरह, कुल 18 आरोपियों का पता चला और इस सनसनीखेज मामले में इन पर मुकदमा दर्ज हुआ

- 1998 में अजमेर की सत्र अदालत ने आठ दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई लेकिन राजस्थान हाई कोर्ट ने 2001 में उनमें से चार को बरी कर दिया। 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने बाकी चारों की सजा घटाकर 10 वर्ष कर दी। इनमें मोइजुल्ला उर्फ पुत्तन, इशरत अली, अनवर चिश्ती और शम्शुद्दीन उर्फ माराडोना शामिल था। 

- 2007 में अजमेर की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने फारूक चिश्ती को भी दोषी ठहराया जिसे पहले पागल घोषित किया गया था। 2012 में सरेंडर करने वाले सलीम चिश्ती ही 2018 तक जेल में था। तब सुहैल पुलिस हिरासत में था और बाकियों को जमानत मिल गई थी। 2013 में राजस्थान हाई कोर्ट ने फारूक चिश्ती की आजीवन कारावास की सजा घटा दी और कहा कि यह जितनी अवधि तक जेल में रह चुका है, वह पर्याप्त है। अब वह दरगाह पर इज्जत पात है।

- आज भी दरगाह पर आदर पा रहे हैं ये दरिंदे । नफीस चिश्ती 2003 तक भागता रहा लेकिन दिल्ली पुलिस ने बुरके में भागने की कोशिश करते हुए उसे दबोच लिया। एक आरोपी इकबाल भट्ट 2005 में गिरफ्तार किया जा सका। सुहैल गनी चिस्ती ने 26 वर्ष बाद 15 फरवरी 2018 को अजमेर कोर्ट में सरेंडर किया। नफीस चिश्ती, इकबाल भट्ट, सलीम चिश्ती, सैयद जमीर हुसैन, नसीम उर्फ टार्जन और सुहैल गनी पर पॉक्सो कोर्ट में मुकदमा चल रहा है, लेकिन ये सभी जमानत पर जेल से बाहर हैं। आज नफीस और फारूक चिश्ती अजमेर में काफी शानो शौकत से रह रहे हैं। दोनों अक्सर दरगार शरीफ जाते हैं और लोग आज भी उनका हाथ चूमते हैं।

Comments

Popular posts from this blog

बेटियों के बलात्कारियों से जब माँ ने कहा "अब्दुल अली एक-एक करके करो, नहीं तो वो मर जाएंगी "।ये सच्ची घटना घटित हुई थी 8 अक्टूबर 2001 को बांग्लादेश में।अनिल चंद्र और उनका परिवार 2 बेटीयों पूर्णिमा व 6 वर्षीय छोटी बेटी के साथ बांग्लादेश के सिराजगंज में रहता था। उनके पास जीने खाने और रहने के लिए पर्याप्त जमीन थी. बस एक गलती उनसे हो गयी, और ये गलती थी एक हिंदु होकर 14 साल व 6 साल की बेटी के साथ बांग्लादेश में रहना। एक क़ाफिर के पास इतनी जमीन कैसे रह सकती है..? यही सवाल था बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिद ज़िया के पार्टी से सम्बंधित कुछ उन्मादी लोगों का।8 अक्टूबर के दिनअब्दुल अली, अल्ताफ हुसैन, हुसैन अली, अब्दुर रउफ, यासीन अली, लिटन शेख और 5 अन्य लोगों ने अनिल चंद्र के घर पर धावा बोल दिया, अनिल चंद्र को मारकर डंडो से बाँध दिया, और उनको काफ़िर कहकर गालियां देने लगे। इसके बाद ये शैतान माँ के सामने ही उस १४ साल की निर्दोष बच्ची पर टूट पड़े और उस वक्त जो शब्द उस बेबस लाचार मां के मुँह से निकले वो पूरी इंसानियत को झंकझोर देने वाले हैं।अपनी बेटी के साथ होते इस अत्याचार को देखकर उसने कहा "अब्दुल अली, एक एक करके करो, नहीं तो मर जाएगी, वो सिर्फ १४ साल की है।"वो यहीं नहीं रुके उन माँ बाप के सामने उनकी छोटी 6 वर्षीय बेटी का भी सभी ने मिलकर ब#लात्कार किया ....

एक थे राघव राम कौल काश्मीरी ब्राह्मण, जिनको गौ मांस खिला कर मुसलमान बनाया गया था! इनके पुत्र का नाम शेख इब्राहीम था। शेख इब्राहीम के पुत्र का नाम शेख अब्दुल्ला! शेख अब्दूल्ला के पुत्र का नाम फारुक अब्दूल्ला... फारुक अब्दूल्ला के पुत्र है उमर अब्दूल्ला।है राघव राम कौल का अब्दूल्ला परिवार। जब तक इनकी ताकत थी कश्मीर में इन्होंने भी लोगों

ऋषिकेश में गङ्गा किनारे चार दिन की सड़ी हुई एक ला#श मिली थी। भीड़ इकट्ठी हो गयी, पुलिस बुला ली गयी। सबने ला#श से बार बार पूछा- "ला#श! कौन हो तुम?"ला#श का मुँह सड़ गया था। वह कुछ बोल नहीं पा रही थी। भारत में पुलिस के आगे जिन्दे लोग नहीं बोल पाते, वह तो फिर भी ला#श थी। हाँ, उसके कपड़ों ने बताया- वह एक बूढ़ी बंगालन स्त्री थी।किसी ने कहा कि मुक्ति मिल गयी। किसी ने परिजनों के लिए धिक्कार की गालियां गढ़ीं। पुलिस ने चौकीदारों से ला#श को तिरपाल में लपेटवाया और ले गयी। चौकीदारों ने मन ही मन गालियां दी- "ऐसी नौकरी तो सा#ली दुश्मन को भी न मिले..."पुलिस मुख्यालय में अधिकारी महीनों तक ला#श से उसका परिचय पूछते रहे। बीच बीच में कुछ पत्रकारों ने भी पूछा, शहर की समाजसेवी संस्थाओं के लोगों ने पूछा, उस इलाके के नेताओं ने पूछा, पर कोई उत्तर नहीं मिला।इन सबने मिल कर महीनों तक कड़ियां जोड़ीं। जाँच हुई, गायब हुए लोगों का पता किया गया,अंदाजे लगाए गए। अब ला#श बोलने लायक हुई। ला#श जानती थी कि यह जादुई यथार्थवाद का युग है, सो उसने बोलने के अनुरोध को स्वीकार कर लिया। इंस्पेक्टर ने अबकी पूछा तो ला#श सुगबुगाई। पुलिस को बल मिला, इंस्पेक्टर ने पूछा- "बुढ़िया बता! किसकी ला#श है तू? ला#श बोली- "बीना दास (वीणा) को जानते हो दारोगा साहब?""कौन बीना दास? मैं नहीं जानता किसी बीना वीणा को...""पद्मश्री बीना दास! सुभाष चन्द्र बोस के गुरु बेनीमाधव दास और समाजसेवी कमला देवी की पुत्री बीना दास। वही बीना, जिसे अंग्रेज गवर्नर को गोली मारने के कारण कालापानी की सजा हुई थी। जिसने सेलुलर जेल में दस वर्ष काटे थे।"हैं,,,?? यह कौन सी कथा है रे बुढ़िया? मैंने तो कभी नाम तक नहीं सुना..." इंस्पेक्टर झुंझला गया था।ला#श ठहाके लगा कर हँसने लगी। कुछ देर बाद बोली- "कोई बात नहीं साहब! आजाद भारत क्यों याद रखे स्वतन्त्रता संग्राम को? सुख के दिनों में दुख की कथाएँ कौन गाये...""अच्छा तो तू ही बता दे उनके बारे में..." सब एक साथ चीखे।ला#श हँसी। बोली, " सुनो! बीना के पिता बंगाल के क्रांतिकारियों में प्रतिष्ठित और पूज्य थे। उसकी माँ लड़कियों के लिए विद्यालय चलाती थी। बचपन से ही उसने सुभाष बाबू को अपने घर आते देखा था और उनसे बहुत प्रभावित रहती थी।"सबकी निगाह ला#श पर जम गई थी। वह बोलती गयी, "कलकत्ता विश्वविद्यालय से उसने बीए की परीक्षा पास की थी। दीक्षांत समारोह के दिन ही उसने अपने जीवन को सार्थक करने का मन बनाया था। इस काम में उसके पिता और मां दोनों उसके साथ थे। माँ ने जाने कहाँ से ला कर उसे भरी हुई पिस्तौल दी थी।विश्वविद्यालय में डिग्री बांटने के लिए गवर्नर स्टैनली जैक्शन आया था। वह जैसे ही मंच पर खड़ा हुआ, वीणा उठ कर आगे बढ़ी, और फायर झोंक दिया। गोली गवर्नर की कनपट्टी को छूती हुई निकक गयी। वह दूसरा फायर करती तबतक इंस्पेक्टर सोहरावर्दी ने एक हाथ से उसका गला पकड़ लिया, और दूसरे हाथ से उसके पिस्तौल वाले हाथों को ऊपर उठा दिया। वह फिर भी फायर करती रही। उसके पांचों फायर बेकार गए..."सबके चेहरे पर आश्चर्य पसरा हुआ था। वे सन्न पड़े चुपचाप सुन रहे थे। लाश ने कहा, " उसके बाद केस चला, दस साल की सजा हुई। सन 1939 तक सजा काटी। छूटने के बाद फिर आंदोलनों में सक्रिय हो गयी। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी जेल गयी..." "फिर?""फिर 1947 में देश आजाद हुआ तो बीना ने विवाह कर लिया। आयु 36 की हो गयी थी, पर सोचा कि अब सुखी जीवन जीने के दिन हैं... पर शायद ईश्वर को मंजूर नहीं था। पति का देहांत हुआ और फिर आगे पीछे कोई न दिखा! बीना ऋषिकेश आ गयी। एक स्कूल में पढ़ाती, उसी से खर्च चल जाता।""फिर?""फिर क्या? एक दिन आया जब उम्र देह पर भारी पड़ने लगी। पढ़ाने की शक्ति नहीं रही। कुछ दिन इधर उधर से मांग कर पेट भर लिया... और एक दिन सड़क पर चलते चलते ठोकर लगी,ऐसी गिरी कि उठ न सकी... वहीं से निकल ली।""ओह... हे भगवान! तुम.. आप वही हैं?"" हाँ जी! पर दुखी मत